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परिचय
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हिंदू धर्म में ध्यान का मूल महत्व
हिंदू दृष्टि में मानव दुःख (दुःख) अविद्या से उत्पन्न होता है—नश्वर शरीर और अहंकार को नित्य आत्मा समझ लेना। ध्यान इस माया को तोड़ने का अनुभवात्मक सेतु है।
यह चित्तवृत्तियों (मन की तरंगों) को शांत करता है ताकि शुद्ध जागरूकता स्पष्ट रूप से प्रतिबिंबित हो।
गहरे ध्यान अवस्थाएँ पूर्व संस्कारों को जलाकर जन्म-मरण के चक्र (संसार) को तोड़ने में सहायक होती हैं।
सभी हिंदू ध्यान परंपराओं का परम लक्ष्य मोक्ष है—द्वैत से मुक्ति और दिव्य एकत्व का साक्षात्कार।
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ध्यान के प्रमुख प्रकार एवं उनकी तकनीकी पद्धतियाँ
हिंदू धर्म में ध्यान साधनाओं का विशाल स्पेक्ट्रम है—मुख्यतः चार योग मार्गों (राज, ज्ञान, भक्ति और कर्म) तथा तांत्रिक परंपराओं के अंतर्गत।
पतंजलि का अष्टांग
पतंजलि अष्टांग मार्ग बताते हैं जिसमें ध्यान अंतिम तीन आंतरिक चरणों (संयम) में आता है।
मन को एक बिंदु पर स्थिर करना—श्वास, देवता की छवि, या भृकुटि के मध्य का स्थान।
उस बिंदु की ओर जागरूकता का अखंड प्रवाह—जैसे एक पात्र से दूसरे में तेल का निर्बाध धारा।
वह अवस्था जहाँ ध्याता, ध्येय और ध्यान की क्रिया के बीच की सीमा पूर्णतः विलीन हो जाती है।
जप एवं पवित्र ध्वनि
जप पवित्र ध्वनियों या संस्कृत मंत्रों का लयबद्ध निरंतर उच्चारण है (जैसे ॐ, महामृत्युंजय, या गुरुमंत्र)। मंत्र कंपन अवचेतन शोर को शांत कर जागरूकता को भीतर खींचते हैं।
ऊँचे स्वर में उच्चारण (प्रारंभिक अवस्था)।
मंद फुसफुसाहट—केवल होठों की गति से दृश्य।
केवल मन में जप (सबसे शक्तिशाली रूप)।
संस्कृत मंत्र
ॐ
ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्। उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माऽमृतात्॥
आत्म-विचार
उपनिषदों के ऋषियों और आधुनिक संतों जैसे रमण महर्षि द्वारा प्रचलित—यह मार्ग विवेक से चेतना की प्रकृति का अन्वेषण करता है।
नेति नेति
नेति नेति (“यह नहीं, यह नहीं”)
अनात्म पहचानों का क्रमशः निषेध—“मैं यह शरीर नहीं, ये विचार नहीं, यह भाव नहीं।”
विचार
विचार (“मैं कौन हूँ?”)
प्रत्येक विचार को उसके स्रोत तक ले जाना—अपरिवर्तनीय साक्षी चेतना का उद्घाटन।
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मुख्य भेद: ये दृष्टिकोण कैसे भिन्न हैं
सभी हिंदू ध्यान परंपराओं का लक्ष्य आत्म-साक्षात्कार है, किंतु तकनीक, प्रवेश बिंदु और दार्शनिक अभिविन्यास में वे स्पष्ट रूप से भिन्न हैं।