दिन 12
Dwadashi (Twelfth Day)
द्वादशी तिथि समाधान और संतुलन की ऊर्जा लेकर आती है। यह विशेष रूप से उन पूर्वजों के लिए अनुष्ठान करने हेतु जानी जाती है जिन्होंने अपने अंतिम वर्षों में संन्यास ले लिया था या विरक्त जीवन व्यतीत किया था।
विशेष स्मरण
संन्यासी, विरक्त या ऐसे बुजुर्ग जिन्होंने अपना जीवन परोपकार और उच्च ज्ञान को समर्पित कर दिया था।
मंत्र
ॐ देवताभ्यः पितृभ्यश्च महायोगिभ्य एव च। नमः स्वधायै नित्यं पितॄणां च नमो नमः॥
Om Devataabhyah Pitribhyashcha Mahayogibhy एव Cha / Namah Swadhayai Nityam Pitrinam Cha Namo Namah
घर पर तर्पण विधि
- मध्यकाल में पूरी श्रद्धा के साथ जल तर्पण संपन्न करें।
- किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद व्यक्ति को दिव्य चेतना का स्वरूप मानकर पूर्ण आदर के साथ भोजन कराएं।
- एकाग्रचित्त होकर या रुद्राक्ष माला की सहायता से इस दिन के मंत्र का 108 बार जाप करें।
इस खंड का परिचय
Ekadashi to Sarvapitri Amavasya (Mahalaya)
नमस्ते। पितृ पक्ष के अंतिम और सबसे प्रभावशाली चरण—एकादशी से सर्वपित्री अमावस्या (महालय) तक—में आपका स्वागत है। जैसा कि मैं हमेशा कहता हूँ कि ये अंतिम दिन अत्यधिक आध्यात्मिक महत्व रखते हैं। चाहे किसी की मृत्यु अचानक हुई हो, तिथि ज्ञात न हो, या पूर्णिमा-अमावस्या के संधियों पर हुई हो, ये अंतिम दिन हमारे वंश की प्रत्येक आत्मा को शांति और तृप्ति प्रदान करते हैं। आइए एकादशी से अमावस्या तक के इन अंतिम दिनों, उनके शुद्ध संस्कृत मंत्रों और उनके लिप्यंतरण (transliteration) को विस्तार से समझें।