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विपश्यना क्या है?
विपश्यना / विपस्सना
शास्त्रीय भारतीय चिंतन में बौद्ध साधनाएँ वैदिक एवं सनातन धर्म की व्यापक छाया से उभरी विशिष्ट धारा हैं। सिद्धार्थ गौतम ने आलार कालाम और उद्दक रामपुत्त के साथ वैदिक ध्यान सीखा, फिर विपश्यना को परिष्कृत किया।
अन्तर्दृष्टि — वस्तुओं को यथाभूत देखना।
पूर्ण उपेक्षा के साथ शारीरिक संवेदनाओं का क्रमबद्ध, निर्विकल्प अवलोकन।
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मूल सिद्धांतिक स्तंभ
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प्रक्रिया एवं चरण
क्रिया और वाणी की शुद्धि — स्थूल मानसिक अशांति को शांत करना।
नासिका द्वार पर सहज श्वास का अवलोकन — एकाग्रता।
सिर से पाँव तक शरीर स्कैन; उपेक्षा से सभी संवेदनाएँ देखकर संस्कार विघटन।
अनित्यता का प्रत्यक्ष साक्षात्कार — शुद्धि और मुक्ति।
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मुख्य दार्शनिक भेद
दोनों धाराएँ एकाग्रता फिर अंतर्दृष्टि अपनाती हैं; दोनों चित्त तरंगों के निरोध चाहती हैं—फिर भी आत्मा और विधि पर भिन्न हैं।
शमथ/धारणा फिर विपश्यना/ध्यान; चित्तवृत्ति निरोध संस्कार विघटन से मेल खाता है।
साझा विरासत
दोनों मोक्ष/निर्वाण चाहते हैं — आसक्ति, मोह और संसार से मुक्ति।
आज विपश्यना, आत्म विचार और राज योग अक्सर पूरक भारतीय आध्यात्मिक विज्ञान के रूप में साधे जाते हैं।