मीराबाई बचपन से कृष्ण की कथाएँ सुनतीं और कविता तथा भजन के माध्यम से अपनी भक्ति व्यक्त करती थीं। बड़े होने पर उनके आसपास के लोग चाहते थे कि वे चुप रहें और हर सामाजिक परंपरा को बिना प्रश्न किए मानें। मीरा ने सम्मानपूर्वक उस भक्ति को छिपाने से इनकार किया जो उनके जीवन को अर्थ देती थी। उन्होंने ऐसी भाषा में भजन गाए जिसे सामान्य लोग समझ सकें और भक्ति को केवल शक्तिशाली या विद्वान लोगों तक सीमित नहीं माना। उनका मार्ग कठिन था, फिर भी उनके गीत पीढ़ियों तक साहस और प्रेम पहुँचाते रहे। मीरा की कथा बताती है कि कोमल आवाज़ भी साहसी हो सकती है, जब वह ईमानदारी से बोले और किसी को छोटा न समझे।