राजकुमार देवव्रत हस्तिनापुर के योग्य उत्तराधिकारी थे। जब उनके पिता राजा शांतनु को एक मछुआरे की बेटी सत्यवती से प्रेम हुआ, तो मछुआरे ने शर्त रखी कि राजा का अगला बेटा ही राजा बनेगा, देवव्रत नहीं। अपने पिता की खुशी के लिए देवव्रत ने नदी किनारे जाकर एक ऐतिहासिक त्याग किया। उन्होंने जीवनभर राजा न बनने और कभी शादी न करने की भीषण प्रतिज्ञा ली, ताकि उनके पिता खुश रह सकें। उनके इस महान त्याग के कारण उन्हें 'भीष्म' कहा गया।