आत्म-संवाद, शर्म, आत्मसम्मान

कोमल शब्द, कोमल स्वयं

Kind Words, Kind Self

उस कठोर भीतरी आवाज़ के लिए जिसे आधुनिक जीवन अक्सर बढ़ा देता है।

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भगवद्गीता ६.५

आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥

सरल अर्थ

तुम अपने मित्र भी हो सकते हो — या अपने शत्रु भी। खुद से बात करने का तरीका दिन बनाता है।

कब पढ़ें

गलती के बाद: “मैं बेकार हूँ” की जगह “मैं सीख रहा/रही हूँ।”

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भगवद्गीता १७.१५

अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्।
स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥

सरल अर्थ

जो शब्द उत्तेजित न करें, सत्य, प्रिय और हितकर हों — वही एक तप है। इस दया में अपना हृदय भी शामिल करो।

कब पढ़ें

पोस्ट/मैसेज से पहले, या खुद को डाँटने से पहले।

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