शोक, हृदय-व्यथा, पुनर्निर्माण

चोट के बाद उपचार

Healing After Hurt

हानि, बिछड़न, और फिर से पूरा होने की धीमी साधना के लिए।

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भगवद्गीता २.२२

वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-
न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥

सरल अर्थ

जैसे पुराने वस्त्र छोड़ नए पहने जाते हैं, जीवन भी अंत से आरंभ की ओर जाता है। बदलाव पवित्र हो सकता है — भले दुख दे।

कब पढ़ें

शोक में: जो समाप्त हुआ उसे सम्मान दो, भविष्य से इनकार मत करो।

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भगवद्गीता २.१४

आगमापायिनोऽनित्यास्तांस्तितिक्षस्व भारत॥

सरल अर्थ

जो आता है, वह जाता भी है। दर्द के साथ धैर्य कमजोरी नहीं — उपचार को समय देने का मार्ग है।

कब पढ़ें

कठिन वर्षगाँठों या अचानक उदासी की लहर पर।

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