अध्याय 1
लिंगोद्भव प्राकट्य एवं शिव लिंग की महिमा
सृष्टि के प्रारंभ में ब्रह्मा और विष्णु के मध्य श्रेष्ठता को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ। उनके अहंकार को शांत करने के लिए भगवान शिव एक अनंत ज्योतिर्मय स्तंभ (ज्योतिर्लिंग) के रूप में प्रकट हुए। ब्रह्मा जी हंस रूप धारण कर ऊपर और विष्णु जी वराह रूप धारण कर नीचे अंत खोजने गए, किंतु दोनों ही अंत न पा सके। विष्णु जी ने सत्य स्वीकार किया, जबकि ब्रह्मा जी ने केतकी के फूल से झूठी साक्षी दिलाई। शिव जी प्रकट हुए और सत्यनिष्ठा के लिए विष्णु जी को आशीर्वाद दिया तथा ब्रह्मा जी की पूजा का अधिकार समाप्त कर यह सिद्ध किया कि शिव लिंग अनंत और निराकार ब्रह्म का प्रतीक है।
अध्याय 2
समुद्र मंथन एवं नीलकंठ अवतार
देवताओं और असुरों द्वारा अमृत प्राप्ति के लिए किए गए समुद्र मंथन से सर्वप्रथम अत्यंत विषैला 'हलाहल' विष निकला, जिसकी ज्वाला से संपूर्ण ब्रह्मांड जलने लगा। कोई उपाय न देखकर सभी देव शिव जी की शरण में गए। परम कृपालु शिव जी ने उस समस्त विष को अपनी हथेली पर एकत्र कर पी लिया। माता पार्वती ने विष को उदर में जाने से रोकने के लिए शिव जी का कंठ पकड़ लिया, जिससे उनका कंठ नीला पड़ गया और वे 'नीलकंठ' कहलाए।
अध्याय 3
माता पार्वती की कठिन तपस्या एवं शिव-विवाह
सती के देहत्याग के पश्चात, उन्होंने हिमालय राज के घर पार्वती के रूप में जन्म लिया। शिव जी को पति रूप में पाने के लिए उन्होंने राजसी वैभव त्याग कर हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की और 'अपर्णा' कहलाईं। शिव जी ने एक वृद्ध वटु का रूप धारण कर अपनी ही निंदा करते हुए उनकी परीक्षा ली, किंतु पार्वती जी अपने निश्चय पर अडिग रहीं। उनकी अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर शिव जी ने उन्हें स्वीकार किया और उनका भव्य दिव्य विवाह संपन्न हुआ।
पठन संदर्भ
कथा, पाठांतर और अभ्यास
यह सार्वजनिक गाइड एक संक्षिप्त भक्तिपूर्ण पुनर्कथन है। विभिन्न पुराणों, रामायण परंपराओं, क्षेत्रों और संप्रदायों में प्रसंग व विवरण अलग हो सकते हैं।
- पहले कथा पढ़ें, फिर नीचे दिए कथा-पाठ पर विचार करें।
- व्रत या विधिवत पाठ के लिए अपने परिवार या परंपरा के स्वीकृत संस्करण का प्रयोग करें।
- संबद्ध देवता गाइड से प्रतीक और उपासना संदर्भ समझें।