इ॒षे त्वो॒र्जे त्वा॑ वा॒यव॑ स्थ दे॒वो वः॑ सवि॒ता प्रार्प॑यतु॒ श्रेष्ठ॑तमाय॒ कर्म॑ण॒ऽआप्या॑यध्वमघ्न्या॒ऽइन्द्रा॑य भा॒गं प्र॒जाव॑तीरनमी॒वाऽअ॑य॒क्ष्मा मा व॑ स्ते॒नऽई॑शत॒ माघश॑ꣳसो ध्रु॒वाऽअ॒स्मिन् गोप॑तौ स्यात ब॒ह्वीर्यज॑मानस्य प॒शून् पा॑हि॥१॥
Iṣe tvorje tvā vāyava stha devo vaḥ savitā prārpayatu śreṣṭhatamāya karmaṇa āpyāyadhvamaghnyā indrāya bhāgamprajāvatīranamīvāayakṣmā mā va stenaīśata māghaśãso dhuravāasmingopatau syāta bahvīḥ yajamānasya paśūnpāhi.
Mantra 1: Best Work Hands
🤲✨
सूर्य और वायु से प्रार्थना करो कि तुम्हारे हाथ और मन सबसे अच्छे काम करें।
याद रखें और अपनाएँ
Whatever you do—homework or helping at home—give it your whole heart.
हे मनुष्य लोगो! जो (सविता) सब जगत् की उत्पत्ति करने वाला सम्पूर्ण ऐश्वर्ययुक्त (देवः) सब सुखों के देने और सब विद्या के प्रसिद्ध करने वाला परमात्मा है, सो (वः) तुम हम और अपने मित्रों के जो (वायवः) सब क्रियाओं के सिद्ध करानेहारे स्पर्श गुणवाले प्राण अन्तःकरण और इन्द्रियां (स्थ) हैं, उनको (श्रेष्ठतमाय) अत्युत्तम (कर्मणे) करने योग्य सर्वोपकारक यज्ञादि कर्मों के लिये (प्रार्पयतु) अच्छी प्रकार संयुक्त करे। हम लोग (इषे) ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
वसोः॑ प॒वित्र॑मसि॒ द्यौर॑सि पृथि॒व्यसि मात॒रिश्व॑नो घ॒र्मोऽसि वि॒श्वधा॑ऽअसि। प॒र॒मेण॒ धाम्ना॒ दृꣳह॑स्व॒ मा ह्वा॒र्मा ते॑ य॒ज्ञप॑तिर्ह्वार्षीत्॥२॥
Vasoḥ pavitramasi dyaurasi pṛthivyasi mātariśvano gharmā si viśvadhāasi.
Mantra 2: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे विद्यायुक्त मनुष्य! तू जो (वसोः) यज्ञ (पवित्रम्) शुद्धि का हेतु (असि) है। (द्यौः) जो विज्ञान के प्रकाश का हेतु और सूर्य की किरणों में स्थ
याद रखें और अपनाएँ
Sacred words remind us to act with care, honesty, and shared joy.
हे विद्यायुक्त मनुष्य! तू जो (वसोः) यज्ञ (पवित्रम्) शुद्धि का हेतु (असि) है। (द्यौः) जो विज्ञान के प्रकाश का हेतु और सूर्य की किरणों में स्थिर होने वाला (असि) है। जो (पृथिवी) वायु के साथ देशदेशान्तरों में फैलनेवाला (असि) है। जो (मातरिश्वनः) वायु को (घर्मः) शुद्ध करनेवाला (असि) है। जो (विश्वधाः) संसार का धारण करनेवाला (असि) है तथा जो (परमेण) उत्तम (धाम्ना) स्थान से (दृꣳहस्व) सुख का बढ़ानेवाला है। इस यज्ञ का (मा) मत...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
वसोः॑ प॒वित्र॑मसि श॒तधा॑रं॒ वसोः॑ प॒वित्र॑मसि स॒हस्र॑धारम्। दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता पु॑नातु॒ वसोः॑ प॒वित्रे॑ण श॒तधा॑रेण सु॒प्वा काम॑धुक्षः॥३॥
Vasoḥ pavitramasi śatadhāraṃ vasoḥ pavitramasi sahasradhāram.
Mantra 3: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
जो (वसोः) यज्ञ (शतधारम्) असंख्यात संसार का धारण करने और (पवित्रम्) शुद्धि करनेवाला कर्म (असि) है तथा जो (वसोः) यज्ञ (सहस्रधारम्) अनेक प्रकार
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जो (वसोः) यज्ञ (शतधारम्) असंख्यात संसार का धारण करने और (पवित्रम्) शुद्धि करनेवाला कर्म (असि) है तथा जो (वसोः) यज्ञ (सहस्रधारम्) अनेक प्रकार के ब्रह्माण्ड को धारण करने और (पवित्रम्) शुद्धि का निमित्त सुख देनेवाला (असि) है, (त्वा) उस यज्ञ को (देवः) स्वयं प्रकाशस्वरूप (सविता) वसु आदि तेंतीस देवों का उत्पत्ति करनेवाला परमेश्वर (पुनातु) पवित्र करे। हे जगदीश्वर! आप हम लोगों से सेवित जो (वसोः) यज्ञ है, उस (पवित्रेण) शुद...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
सा वि॒श्वायुः॒ सा वि॒श्वक॑र्मा॒ सा वि॒श्वधा॑याः। इन्द्र॑स्य त्वा भा॒गꣳ सोमे॒नात॑नच्मि॒ विष्णो॑ ह॒व्यꣳर॑क्ष॥४॥
Sā viśvāyuḥ sā viśvakarmā sā viśvadhāyāḥ.
Mantra 4: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे (विष्णो) व्यापक ईश्वर! आप जिस वाणी का धारण करते हैं, (सा) वह (विश्वायुः) पूर्ण आयु की देने वाली (सा) वह (विश्वकर्मा) जिससे कि सम्पूर्ण क्
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हे (विष्णो) व्यापक ईश्वर! आप जिस वाणी का धारण करते हैं, (सा) वह (विश्वायुः) पूर्ण आयु की देने वाली (सा) वह (विश्वकर्मा) जिससे कि सम्पूर्ण क्रियाकाण्ड सिद्ध होता है और (सा) वह (विश्वधायाः) सब जगत् को विद्या और गुणों से धारण करने वाली है। पूर्व मन्त्र में जो प्रश्न है, उसके उत्तर में यही तीन प्रकार की वाणी ग्रहण करने योग्य है, इसी से मैं (इन्द्रस्य) परमेश्वर के (भागम्) सेवन करने योग्य यज्ञ को (सोमेन) विद्या से सिद्ध...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
अग्ने॑ व्रतपते व्र॒तं च॑रिष्यामि॒ तच्छ॑केयं॒ तन्मे॑ राध्यताम्।इ॒दम॒हमनृ॑तात् स॒त्यमुपै॑मि॥५॥
Agne vratapate vrataṃ cariṣyāmi tacchakeyaṃ tanme rādhyatām.
Mantra 5: Truth Promise
🔥📿
अग्निदेव अच्छे व्रत निभाने और सत्य की ओर चलने में सहायता करते हैं।
याद रखें और अपनाएँ
A small honest promise kept is stronger than a big empty one.
हे (व्रतपते) सत्यभाषण आदि धर्मों के पालन करने और (अग्ने) सत्य उपदेश करने वाले परमेश्वर! मैं (अनृतात्) जो झूंठ से अलग (सत्यम्) वेदविद्या, प्रत्यक्ष आदि प्रमाण, सृष्टिक्रम, विद्वानों का संग, श्रेष्ठ विचार तथा आत्मा की शुद्धि आदि प्रकारों से जो निर्भ्रम, सर्वहित, तत्त्व अर्थात् सिद्धान्त के प्रकाश करनेहारों से सिद्ध हुआ, अच्छी प्रकार परीक्षा किया गया (व्रतम्) सत्य बोलना, सत्य मानना और सत्य करना है, उसका (उपैमि) अनुष्...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
कस्त्वा॑ युनक्ति॒ स त्वा॑ युनक्ति॒ कस्मै॑ त्वा युनक्ति॒ तस्मै॑ त्वा युनक्ति। कर्म॑णे वां॒ वेषा॑य वाम्॥६॥
Kastvā yunakti sa tvā yunakti kasmai tvā yunakti tasmai tvā yunakti.
Mantra 6: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
(कः) कौन सुख स्वरूप (त्वा) तुझको अच्छी-अच्छी क्रियाओं के सेवन करने के लिये (युनक्ति) आज्ञा देता है। (सः) सो जगदीश्वर (त्वा) तुम को विद्या आद
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(कः) कौन सुख स्वरूप (त्वा) तुझको अच्छी-अच्छी क्रियाओं के सेवन करने के लिये (युनक्ति) आज्ञा देता है। (सः) सो जगदीश्वर (त्वा) तुम को विद्या आदिक शुभ गुणों के प्रकट करने के लिये विद्वान् वा विद्यार्थी होने को (युनक्ति) आज्ञा देता है। (कस्मै) वह किस-किस प्रयोजन के लिये (त्वा) मुझ और तुझ को (युनक्ति) युक्त करता है, (तस्मै) पूर्वोक्त सत्यव्रत के आचरण रूप यज्ञ के लिये (त्वा) धर्म के प्रचार करने में उद्योगी को (युनक्ति) आ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
प्रत्यु॑ष्ट॒ꣳरक्षः॒ प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरा॑तयो॒ निष्ट॑प्त॒ꣳरक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ऽअरा॑तयः। उ॒र्वन्तरि॑क्ष॒मन्वे॑मि॥७॥
Pratyuṣṭã rakṣaḥ pratyuṣṭā arātayaḥ.
Mantra 7: Clear the Dark
☀️🛡️
बुरी भावनाओं को जलाकर मन को खुले आकाश जैसा हल्का बनाओ।
याद रखें और अपनाएँ
Clear space outside and inside—both help you feel brave.
मुझ को चाहिये कि पुरुषार्थ के साथ (रक्षः) दुष्ट गुण और दुष्ट स्वभाव वाले मनुष्य को (प्रत्युष्टम्) निश्चय करके निर्मूल करूं तथा (अरातयः) जो राति अर्थात् दान आदि धर्म से रहित दयाहीन दुष्ट शत्रु हैं, उनको (प्रत्युष्टाः) प्रत्यक्ष निर्मूल (रक्षः) वा दुष्ट स्वभाव, दुष्टगुण, विद्याविरोधी, स्वार्थी मनुष्य और (निष्टप्तम्) (अरातयः) छलयुक्त होके विद्या के ग्रहण वा दान से रहित दुष्ट प्राणियों को (निष्टप्ताः) निरन्तर सन्तापयु...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
धूर॑सि॒ धूर्व॒ धूर्व॑न्तं॒ धूर्व॒ तं यो॒ऽस्मान् धूर्व॑ति॒ तं धू॑र्व॒ यं व॒यं धूर्वा॑मः। दे॒वाना॑मसि॒ वह्नि॑तम॒ꣳ सस्नि॑तमं॒ पप्रि॑तमं॒ जुष्ट॑तमं देव॒हूत॑मम्॥८॥
Dhūrasi dhūrva dhūrvantaṃ dhūrva tã yo smāndhūrvati taṃ dhūrva yã vayandhūrvāmaḥ.
Mantra 8: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे परमेश्वर! आप (धूः) सब दोषों के नाश और जगत् की रक्षा करने वाले (असि) हैं, इस कारण हम लोग इस बुद्धि से (देवानाम्) विद्वानों को विद्या मोक्ष
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हे परमेश्वर! आप (धूः) सब दोषों के नाश और जगत् की रक्षा करने वाले (असि) हैं, इस कारण हम लोग इस बुद्धि से (देवानाम्) विद्वानों को विद्या मोक्ष और सुख में (वह्नितमम्) यथायोग्य पहुंचाने (सस्नितमम्) अतिशय कर के शुद्ध करने (पप्रितमम्) सब विद्या और आनन्द से संसार को पूर्ण करने (जुष्टतमम्) धार्मिक भक्तजनों के सेवा करने योग्य और (देवहूतमम्) विद्वानों की स्तुति करने योग्य आप की नित्य उपासना करते हैं। (यः) जो कोई द्वेषी, छली...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
अह्रु॑तमसि हवि॒र्धानं॒ दृꣳह॑स्व॒ मा ह्वा॒र्मा ते॑ य॒ज्ञप॑तिर्ह्वार्षीत्। विष्णु॑स्त्वा क्रमतामु॒रु वाता॒याप॑हत॒ꣳरक्षो॒ यच्छ॑न्तां॒ पञ्च॑॥९॥
Ahrutamasi havirdhānaṃ dṛ̃hasva mā hvārmā yajñapatirhvārṣīt.
Mantra 9: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे ऋत्विग् मनुष्य! तुम जो अग्नि से बढ़ा हुआ (अह्रुतम्) कुटिलतारहित (हविर्धानम्) होम के योग्य पदार्थों का धारण करना है, उस को (दृंहस्व) बढ़ाओ
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हे ऋत्विग् मनुष्य! तुम जो अग्नि से बढ़ा हुआ (अह्रुतम्) कुटिलतारहित (हविर्धानम्) होम के योग्य पदार्थों का धारण करना है, उस को (दृंहस्व) बढ़ाओ, किन्तु किसी समय में (मा ह्वाः) उस का त्याग मत करो तथा यह (ते) तुम्हारा (यज्ञपतिः) यजमान भी उस यज्ञ के अनुष्ठान को (मा ह्वार्षीत्) न छोड़े। इस प्रकार तुम लोग (पञ्च) एक तो ऊपर की चेष्टा होना, दूसरा नीचे को, तीसरा चेष्टा से अपने अङ्गों को संकोचना, चौथा उनका फैलाना, पांचवां चलना...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। अ॒ग्नये॒ जुष्टं॑ गृह्णाम्य॒ग्नीषोमा॑भ्यां॒ जुष्टं॑ गृह्णामि॥१०॥
Devasya tvā savituḥ prasaveśvinorbāhubhyāṃ pūṣṇo hastābhyām.
Mantra 10: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
मैं (सवितुः) सब जगत् के उत्पन्नकर्त्ता सकल ऐश्वर्य के दाता तथा (देवस्य) संसार का प्रकाश करनेहारे और सब सुखदायक परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न
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मैं (सवितुः) सब जगत् के उत्पन्नकर्त्ता सकल ऐश्वर्य के दाता तथा (देवस्य) संसार का प्रकाश करनेहारे और सब सुखदायक परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए इस संसार में (अश्विनोः) सूर्य्य और चन्द्रमा के (बाहुभ्याम्) बल और वीर्य्य से तथा (पूष्णः) पुष्टि करने वाले प्राण के (हस्ताभ्याम्) ग्रहण और त्याग से (अग्नये) अग्निविद्या के सिद्ध करने के लिये (जुष्टम्) विद्या पढ़ने वाले जिस कर्म की सेवा करते हैं, (त्वा) उसे (गृह्णामि) ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
भू॒ताय॑ त्वा॒ नारा॑तये॒ स्वरभि॒विख्ये॑षं॒ दृꣳह॑न्तां॒ दुर्याः॑ पृथि॒व्यामु॒र्वन्तरि॑क्ष॒मन्वे॑मि। पृ॒थि॒व्यास्त्वा॒ नाभौ॑ सादया॒म्यदि॑त्याऽउ॒पस्थेऽग्ने॑ ह॒व्यꣳ र॑क्ष॥११॥
Bhūtāya tvā nārātaye.
Mantra 11: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
मैं जिस यज्ञ को (भूताय) प्राणियों के सुख तथा (अरातये) दारिद्र्य आदि दोषों के नाश के लिये (अदित्या) वेदवाणी वा विज्ञानप्रकाश के (उपस्थे) गुणो
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मैं जिस यज्ञ को (भूताय) प्राणियों के सुख तथा (अरातये) दारिद्र्य आदि दोषों के नाश के लिये (अदित्या) वेदवाणी वा विज्ञानप्रकाश के (उपस्थे) गुणों में (सादयामि) स्थापना करता हूं और (त्वा) उसको कभी (न) नहीं छोड़ता हूं। हे विद्वान् लोगो! तुम को उचित है कि (पृथिव्याम्) विस्तृत भूमि में (दुर्य्याः) अपने घर (दृंहन्ताम्) बढ़ाने चाहिये। मैं (पृथिव्याः) (नाभौ) पृथिवी के बीच में जिन गृहों में (स्वः) जल आदि सुख के पदार्थों को (अ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
प॒वित्रे॑ स्थो वैष्ण॒व्यौ सवि॒तुर्वः॑ प्रस॒व उत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य्य॑स्य रश्मिभिः॑। देवी॑रापोऽअग्रेगुवोऽअग्रेपु॒वोऽग्र॑ऽइ॒मम॒द्य य॒ज्ञं न॑य॒ताग्रे॑ य॒ज्ञप॑तिꣳ सु॒धातुं॑ य॒ज्ञप॑तिं देव॒युव॑म्॥१२॥
Pavitre stho vaiṣṇavyau saviturvaḥ prasavautpunāmyacchidreṇa pavitreṇa sūryasya raśmibhiḥ.
Mantra 12: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे विद्वान् लोगो! तुम जैसे (सवितुः) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुस इस संसार में (अच्छिद्रेण) निर्दोष और (पवित्रेण) पवित्र करने का हेत
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हे विद्वान् लोगो! तुम जैसे (सवितुः) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुस इस संसार में (अच्छिद्रेण) निर्दोष और (पवित्रेण) पवित्र करने का हेतु जो (सूर्य्यस्य) सूर्य्य की (रश्मिभिः) किरण हैं, उन से (वैष्णव्यौ) यज्ञसम्बन्धी प्राण और अपान की गति तथा (पवित्रे) पदार्थों के भी पवित्र करने में हेतु (स्थः) हों और जैसे उक्त सूर्य्य की किरणों से (अग्रेगुवः) आगे समुद्र वा अन्तरिक्ष में चलनेवाले (अग्रेपुवः) प्रथम पृथिवी में रह...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
यु॒ष्माऽइन्द्रो॑ऽवृणीत वृत्र॒तूर्य्ये॑ यू॒यमिन्द्र॑मवृणीध्वं वृत्र॒तूर्ये॒ प्रोक्षि॑ता स्थ। अ॒ग्नये॑ त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑म्य॒ग्नीषोमा॑भ्यां त्वा॒ जुष्टं॒ प्रोक्षा॑मि। दैव्या॑य॒ कर्म॑णे शुन्धध्वं देवय॒ज्यायै॒ यद्वोऽशु॑द्धाः पराज॒घ्नुरि॒दं व॒स्तच्छु॑न्धामि॥१३॥
Yuṣmāindro vṛṇīta vṛtratūrye yūyamindramavṛṇīdhvã vṛtratūrye prokṣitā stha.
Mantra 13: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
यह जैसे (इन्द्रः) सूर्य्यलोक (वृत्रतूर्य्ये) मेघ के वध के लिये (युष्माः) पूर्वोक्त जलों को (अवृणीत) स्वीकार करता है, जैसे जल (इन्द्रम्) वायु
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यह जैसे (इन्द्रः) सूर्य्यलोक (वृत्रतूर्य्ये) मेघ के वध के लिये (युष्माः) पूर्वोक्त जलों को (अवृणीत) स्वीकार करता है, जैसे जल (इन्द्रम्) वायु को (अवृणीध्वम्) स्वीकार करते हैं, वैसे ही (यूयम्) हे मनुष्यो! तुम लोग उन जल, औषधि, रसों को शुद्ध करने के लिये (वृत्रतूर्य्ये) मेघ के शीघ्रवेग में (प्रोक्षिताः) संसारी पदार्थों के सींचने वाले जलों को (अवृणीध्वम्) स्वीकार करो और जैसे वे जल शुद्ध (स्थ) होते हैं, वैसे तुम भी शुद्...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
शर्मा॒स्यव॑धूत॒ꣳ रक्षोऽव॑धूता॒ऽअरा॑त॒योऽदि॑त्या॒स्त्वग॑सि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वेत्तु। अद्रि॑रसि वानस्प॒त्यो ग्रावा॑सि पृ॒थुबु॑ध्नः॒ प्रति॒ त्वादि॑त्या॒स्त्वग्वे॑त्तु॥१४॥
Śarmāsyavadhūtã rakṣovadhūtāarātayodityāstvagasi prati tvāditirvettu.
Mantra 14: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे मनुष्यो! तुम्हारा घर (शर्म) सुख देनेवाला (असि) हो। उस घर से (रक्षः) दुष्टस्वभाव वाले प्राणी (अवधूतम्) अलग करो और (अरातयः) दान आदि धर्मरहि
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हे मनुष्यो! तुम्हारा घर (शर्म) सुख देनेवाला (असि) हो। उस घर से (रक्षः) दुष्टस्वभाव वाले प्राणी (अवधूतम्) अलग करो और (अरातयः) दान आदि धर्मरहित शत्रु (अवधूताः) दूर हों। उक्त गृह (अदित्याः) पृथिवी की (त्वक्) त्वचा के तुल्य (असि) हों, (अदितिः) ज्ञानस्वरूप ईश्वर ही से उस घर को (प्रतिवेत्तु) सब मनुष्य जानें और प्राप्त हों तथा जो (वानस्पत्यः) वनस्पति के निमित्त से उत्पन्न होने (पृथुबुध्नः) अतिविस्तारयुक्त अन्तरिक्ष में र...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
अ॒ग्नेस्त॒नूर॑सि वा॒चो वि॒सर्ज॑नं दे॒ववी॑तये त्वा गृह्णामि बृ॒हद् ग्रा॑वासि वानस्प॒त्यः सऽइ॒दं दे॒वेभ्यो॑ ह॒विः श॑मीष्व सु॒शमि॑ शमीष्व। हवि॑ष्कृ॒देहि॒ हवि॑ष्कृ॒देहि॑॥१५॥
Agnestanūrasi vāco visarjanandevavītaye tvā gṛhṇāmi bṛhadgrāvāsi vānaspatyaḥ sa idandevebhyo haviḥ śamīṣva suśami śamīṣva haviṣkṛdehi haviṣkṛdehi.
Mantra 15: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
मैं सब जनों के सहित जिस हवि अर्थात् पदार्थ के संस्कार के लिये (बृहद्ग्रावा) बड़े-बड़े पत्थर (असि) हैं और (वानस्पत्यः) काष्ठ के मूसल आदि पदार
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मैं सब जनों के सहित जिस हवि अर्थात् पदार्थ के संस्कार के लिये (बृहद्ग्रावा) बड़े-बड़े पत्थर (असि) हैं और (वानस्पत्यः) काष्ठ के मूसल आदि पदार्थ (देवेभ्यः) विद्वान् वा दिव्यगुणों के लिये उस यज्ञ को (देववीतये) श्रेष्ठ गुणों के प्रकाश और श्रेष्ठ विद्वान् वा विविध भोगों की प्राप्ति के लिये (प्रतिगृह्णामि) ग्रहण करता हूं। हे विद्वान् मनुष्य! तुम (देवेभ्यः) विद्वानों के सुख के लिये (सु, एमि) अच्छे प्रकार दुःख शान्त करने ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
कु॒क्कु॒टोऽसि॒ मधु॑जिह्व॒ऽइष॒मूर्ज॒माव॑द॒ त्वया॑ व॒यꣳ स॑ङ्घा॒तꣳ स॑ङ्घातं जेष्म व॒र्षवृ॑द्धमसि॒ प्रति॑ त्वा व॒र्षवृ॑द्धं वेत्तु॒ परा॑पूत॒ꣳ रक्षः॒ परा॑पूता॒ अरा॑त॒योऽप॑हत॒ꣳ रक्षो॑ वा॒युर्वो॒ विवि॑नक्तु दे॒वो वः॑ सवि॒ता हिर॑ण्यपाणिः॒ प्रति॑गृभ्णा॒त्वच्छि॑द्रेण पा॒णिना॑॥१६॥
Kukkuṭo si madhujihvaiṣamūrjamāvada tvayā vayã saṅdhātãsaṅdhātañjeṣma varṣavṛddhamasi prati tvā varṣavṛddhaṃ vettu parāpūtã rakṣaḥ parāpūtāarātayo apahatã rakṣo vāyurvo vi vinaktu devo vaḥ savitā hiraṇyapāṇiḥ prati gṛbhṇātvacchidreṇa pāṇinā.
Mantra 16: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
जिस कारण यह यज्ञ (मधुजिह्वः) जिस में मधुर गुणयुक्त वाणी हो तथा (कुक्कुटः) चोर वा शत्रुओं का विनाश करने वाला (असि) है और (इषम्) अन्न आदि पदार
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जिस कारण यह यज्ञ (मधुजिह्वः) जिस में मधुर गुणयुक्त वाणी हो तथा (कुक्कुटः) चोर वा शत्रुओं का विनाश करने वाला (असि) है और (इषम्) अन्न आदि पदार्थ वा (ऊर्जम्) विद्या आदि बल और उत्तम से उत्तम रस को देता है, इसी से उसका अनुष्ठान सदा करना चाहिये। हे विद्वान् लोगो! तुम उक्त गुणों को देने वाला जो तीन प्रकार का यज्ञ है, उसके अनुष्ठान और गुण के ज्ञाता (असि) हो, अतः हम लोगों को भी उसके गुणों का (आवद) उपदेश करो, जिससे (वयम्) ह...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
धृष्टि॑र॒स्यपा॑ऽग्नेऽअ॒ग्निमा॒मादं॑ जहि॒ निष्क्र॒व्याद॑ꣳ से॒धा दे॑व॒यजं॑ वह। ध्रु॒वम॑सि पृथि॒वीं दृ॑ꣳह ब्रह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ सजात॒वन्युप॑दधामि॒ भ्रातृ॑व्यस्य व॒धाय॑॥१७॥
Dhṛṣṭirasyapāgneagnimāmādañjahi niṣkravyādã sedhā ā devayajã vaha.
Mantra 17: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे (अग्ने) परमेश्वर! आप (धृष्टिः) प्रगल्भ अर्थात् अत्यन्त निर्भय (असि) हैं, इस कारण (निष्क्रव्यादम्) पके हुए भस्म आदि पदार्थों को छोड़ के (आ
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हे (अग्ने) परमेश्वर! आप (धृष्टिः) प्रगल्भ अर्थात् अत्यन्त निर्भय (असि) हैं, इस कारण (निष्क्रव्यादम्) पके हुए भस्म आदि पदार्थों को छोड़ के (आमादम्) कच्चे पदार्थ जलाने और (देवयजम्) विद्वान् वा श्रेष्ठ गुणों से मिलाप कराने वाले (अग्निम्) भौतिक वा विद्युत् अर्थात् बिजुलीरूप अग्नि को आप (सेध) सिद्ध कीजिये। इस प्रकार हम लोगों के मङ्गल अर्थात् उत्तम-उत्तम सुख होने के लिये शास्त्रों की शिक्षा कर के दुःखों को (अपजहि) दूर क...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
अग्ने॒ ब्रह्म॑ गृभ्णीष्व ध॒रुण॑मस्य॒न्तरि॑क्षं दृꣳह ब्रह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ सजात॒वन्युप॑दधामि॒ भ्रातृ॑व्यस्य व॒धाय॑। ध॒र्त्रम॑सि॒ दिवं॑ दृꣳह ब्रह्म॒वनि॑ त्वा क्षत्र॒वनि॑ सजात॒वन्युप॑दधामि॒ भ्रातृ॑व्यस्य व॒धाय॑। विश्वा॑भ्य॒स्त्वाशा॑भ्य॒ऽउप॑दधामि॒ चित॑ स्थोर्ध्व॒चितो॒ भृगू॑णा॒मङ्गि॑रसां॒ तप॑सा तप्यध्वम्॥१८॥
Agne brahma gṛbhṇīṣva dharuṇamasyantarikṣandṛ̃ha brahmavani tvā kṣatravani sajātavanyupa dadhāmi bhrātṛvyasya badhāya.
Mantra 18: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे (अग्ने) परमेश्वर! आप (धरुणम्) सब के धारण करने वाले (असि) हैं, इससे मेरी (ब्रह्म) वेद मन्त्रों से की हुई स्तुति को (गृभ्णीष्व) ग्रहण कीजिय
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हे (अग्ने) परमेश्वर! आप (धरुणम्) सब के धारण करने वाले (असि) हैं, इससे मेरी (ब्रह्म) वेद मन्त्रों से की हुई स्तुति को (गृभ्णीष्व) ग्रहण कीजिये तथा (अन्तरिक्षम्) आत्मा में स्थित जो अक्षय ज्ञान है, उसको (दृंह) बढ़ाइये। मैं (भ्रातृव्यस्य) शत्रुओं के (वधाय) विनाश के लिये (ब्रह्मवनि) सब मनुष्यों के सुख के निमित्त वेद के शाखा-शाखान्तर द्वारा विभाग करने वाले ब्राह्मण तथा (क्षत्रवनि) राजधर्म के प्रकाश करनेहारे (सजातवनि) जो...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
शर्मा॒स्यव॑धूत॒ꣳ रक्षोऽव॑धूता॒ऽअरा॑त॒योऽदि॑त्या॒स्त्वग॑सि॒ प्रति॒ त्वादि॑तिर्वेतु। धि॒षणा॑सि पर्व॒ती प्रति॒ त्वादि॑त्या॒स्त्वग्वे॑त्तु दि॒वः स्क॑म्भ॒नीर॑सि धि॒षणा॑सि पार्वते॒यी प्रति॑ त्वा पर्व॒ती वे॑त्तु ॥१९॥
Śarmāsyavadhūtã rakṣovadhūtāarātayodityāstvagasi prati tvāditirvettu.
Mantra 19: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे मनुष्यो! तुम लोग जो यज्ञ (शर्म) सुख का देने वाला (असि) है और (अदितिः) नाशरहित है तथा जिससे (रक्षः) दुःख और दुष्टस्वभावयुक्त मनुष्य (अवधूत
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हे मनुष्यो! तुम लोग जो यज्ञ (शर्म) सुख का देने वाला (असि) है और (अदितिः) नाशरहित है तथा जिससे (रक्षः) दुःख और दुष्टस्वभावयुक्त मनुष्य (अवधूतम्) विनाश को प्राप्त तथा (अरातयः) दान आदि धर्मों से रहित पुरुष (अवधूताः) नष्ट (असि) होते हैं और जो (अदित्याः) अन्तरिक्ष वा पृथिवी के (त्वक्) त्वचा के समान (असि) है, (त्वा) उसे (प्रति वेत्तु) जानो और जिस विद्यारूप उक्त यज्ञ से (पर्वती) बहुत ज्ञान वाली (दिवः) प्रकाशमान सूर्यादि ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
धा॒न्यमसि धिनु॒हि दे॒वान् प्रा॒णाय॑ त्वोदा॒नाय॑ त्वा व्या॒नाय॑ त्वा। दी॒र्घामनु॒ प्रसि॑ति॒मायु॑षे धां दे॒वो वः॑ सवि॒ता हिर॑ण्यपाणिः॒ प्रति॑गृभ्णा॒त्वच्छि॑द्रेण पा॒णिना॒ चक्षु॑षे त्वा म॒हीनां॒ पयो॑ऽसि॥ २०॥
Dhānyamasi dhinuhi devān prāṇāya tvodānāya tvā vyānāya tvā.
Mantra 20: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
जो (धान्यम्) यज्ञ से शुद्ध उत्तम स्वभाववाला सुख का हेतु रोग का नाश करने वाला तथा चावल आदि अन्न वा (पयः) जल (असि) है, वह (देवान्) विद्वान् वा
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जो (धान्यम्) यज्ञ से शुद्ध उत्तम स्वभाववाला सुख का हेतु रोग का नाश करने वाला तथा चावल आदि अन्न वा (पयः) जल (असि) है, वह (देवान्) विद्वान् वा जीव तथा इन्द्रियों को (धिनुहि) तृप्त करता है, इस कारण हे मनुष्यो! मैं जिस प्रकार (त्वा) उसे (प्राणाय) अपने जीवन के लिये वा (त्वा) उसे (उदानाय) स्फूर्ति बल और पराक्रम के लिये वा (त्वा) उसे (व्यानाय) सब शुभ गुण, शुभ कर्म वा विद्या के अङ्गों के फैलाने के लिये तथा (दीर्घाम्) बहुत...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। सं व॑पामि॒ समाप॒ऽओष॑धीभिः॒ समोष॑धयो॒ रसे॑न। सꣳ रे॒वती॒र्जग॑तीभिः पृच्यन्ता॒ सं मधु॑मती॒र्मधु॑मतीभिः पृच्यन्ताम्॥ २१॥
Devasya tvā savituḥ prasaveśvinorbāhubhyāṃ pūṣṇo hastābhyām.
Mantra 21: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे मनुष्यो! जैसे मैं (सवितुः) सकल ऐश्वर्य्य के देने वाले (देवस्य) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए प्रत्यक्ष संसार में, सूर्य्यलोक के प
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हे मनुष्यो! जैसे मैं (सवितुः) सकल ऐश्वर्य्य के देने वाले (देवस्य) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए प्रत्यक्ष संसार में, सूर्य्यलोक के प्रकाश में (अश्विनोः) सूर्य्य और भूमि के तेज की (बाहुभ्याम्) दृढ़ता से (पूष्णः) पुष्टि करने वाले वायु के (हस्ताभ्याम्) प्राण और अपान से (त्वा) पूर्वोक्त तीन प्रकार के यज्ञ का (संवपामि) विस्तार करता हूं, वैसे ही तुम भी उसको विस्तार से सिद्ध करो। जैसे इस उत्पन्न किये हुए संसार मे...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
जन॑यत्यै त्वा॒ संयौ॑मी॒दम॒ग्नेरि॒दम॒ग्नीषोम॑योरि॒षे त्वा॑ घ॒र्मोऽसि वि॒श्वायु॑रु॒रुप्र॑थाऽउ॒रु प्र॑थस्वो॒रु ते॑ य॒ज्ञप॑तिः प्रथताम॒ग्निष्टे॒ त्वचं॒ मा हि॑ꣳसीद् दे॒वस्त्वा॑ सवि॒ता श्र॑पयतु॒ वर्षि॒ष्ठेऽधि॒ नाके॑॥ २२॥
Janayatyai tvā saṃyaumīdamagneridamagnīṣomayoriṣe tvā gharmāsi viśvāyururuprathāuru prathasvoru te yajñapatiḥ prathatāmagniṣṭe tvacammā hĩsīddevastvā savitā śrapayatu varṣiṣṭhedhi nāke.
Mantra 22: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे मनुष्यो! जैसे मैं (जनयत्यै) सर्व सुख उत्पन्न करने वाली राज्यलक्ष्मी के लिये (त्वा) उस यज्ञ को (संयौमि) अग्नि के बीच में पदार्थों को छोड़क
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हे मनुष्यो! जैसे मैं (जनयत्यै) सर्व सुख उत्पन्न करने वाली राज्यलक्ष्मी के लिये (त्वा) उस यज्ञ को (संयौमि) अग्नि के बीच में पदार्थों को छोड़कर युक्त करता हूं, वैसे ही तुम लोगों को भी अग्नि के संयोग से सिद्ध करना चाहिये। जो हम लोगों का (इदम्) यह संस्कार किया हुआ हवि (अग्नेः) अग्नि के बीच में छोड़ा जाता है, (इदम्) वह विस्तार को प्राप्त होकर (अग्नीषोमयोः) अग्नि और सोम के बीच पहुंच कर (इषे) अन्न आदि पदार्थों के उत्पन्न...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
मा भे॒र्मा॒ संवि॑क्था॒ऽअत॑मेरुर्य॒ज्ञोऽत॑मेरु॒र्यज॑मानस्य प्र॒जा भू॑यात् त्रि॒ताय॑ त्वा द्वि॒ताय॑ त्वैक॒ताय॑ त्वा॥२३॥
Mā bhermā sãvikthātameruryajño tameruryajamānasya prajā bhūyāttritāya tvā dvitāya tvaikatāya tvā.
Mantra 23: Do Not Fear
🌱💛
डरकर मत सिकुड़ो; स्थिर रहो ताकि शुभ कार्य बढ़ें।
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Courage is staying calm and kind when something feels hard.
हे विद्वान् पुरुषो! तुम (अतमेरुः) श्रद्धालु होकर (यजमानस्य) यजमान के यज्ञ के अनुष्ठान से (मा भेः) भय मत करो और उससे (मा संविक्थाः) मत चलायमान हो। इस प्रकार (यज्ञः) यज्ञ करते हुए तुम को उत्तम से उत्तम (अतमेरुः) ग्लानिरहित श्रद्धावान् (प्रजा) सन्तान (भूयात्) प्राप्त हो और मैं (त्वा) भौतिक अग्नि को उक्त गुणयुक्त तथा (एकताय) सत्य सुख के लिये (द्विताय) वायु तथा वृष्टि जल की शुद्धि तथा (त्रिताय) अग्नि, कर्म और हवि के हो...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
दे॒वस्य॑ त्वा सवि॒तुः प्र॑स॒वेऽश्विनो॑र्बा॒हुभ्यां॑ पू॒ष्णो हस्ता॑भ्याम्। आद॑देऽध्वर॒कृतं॑ दे॒वेभ्य॒ऽइन्द्र॑स्य बा॒हुर॑सि॒ दक्षि॑णः स॒हस्र॑भृष्टिः श॒तते॑जा वा॒युर॑सि ति॒ग्मते॑जा द्विष॒तो व॒धः॥२४॥
Devasya tvā savituḥ prasaveśvinorbāhubhyāmpūṣṇo hastābhyām.
Mantra 24: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
मैं (सवितुः) अन्तर्यामी प्रेरणा करने (देवस्य) सब आनन्द के देने वाले परमेश्वर की (प्रसवे) प्रेरणा में (अश्विनोः) सूर्य्य, चन्द्र और अध्वर्य्य
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मैं (सवितुः) अन्तर्यामी प्रेरणा करने (देवस्य) सब आनन्द के देने वाले परमेश्वर की (प्रसवे) प्रेरणा में (अश्विनोः) सूर्य्य, चन्द्र और अध्वर्य्युओं के [बाहुभ्याम्] बल और वीर्य्य से तथा (पूष्णः) पुष्टिकारक वायु के (हस्ताभ्याम्) जो कि ग्रहण और त्याग के हेतु उदान और अपान हैं, उन से (देवेभ्यः) विद्वान् वा दिव्य सुखों की प्राप्ति के लिये (अध्वरकृतम्) यज्ञ से सुखकारक [ (त्वा) उस] कर्म को (आददे) अच्छे प्रकार ग्रहण करता हूं औ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
पृथि॑वि देवयज॒न्योष॑ध्यास्ते॒ मूलं॒ मा हि॑ꣳसिषं व्र॒जं ग॑च्छ गो॒ष्ठानं वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्या श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क्॥२५॥
Pṛthivi devayajanyoṣadhyāste mūlammā hĩsiṣãvrajaṅgaccha goṣṭhānãvarṣatu te dyaurbadhāna deva savitaḥ paramasyāmpṛthivyā̃ śatena pāśairyā smāndveṣṭi yañca vayandviṣmastamato mā mauk.
Mantra 25: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे (देव) सूर्य्यादि जगत् के प्रकाश करने तथा (सवितः) राज्य और ऐश्वर्य्य के देने वाले परमेश्वर! (ते) आपकी कृपा से मैं (देवयजनि) विद्वानों के य
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हे (देव) सूर्य्यादि जगत् के प्रकाश करने तथा (सवितः) राज्य और ऐश्वर्य्य के देने वाले परमेश्वर! (ते) आपकी कृपा से मैं (देवयजनि) विद्वानों के यज्ञ करने की जगह (ते) यह जो (पृथिवि) भूमि है, उसके [और (ओषध्याः) जो यवादि ओषधि हैं] उनके (मूलम्) वृद्धि करने वाले मूल को (मा हिꣳसिषम्) नाश न करूँ और मैं (पृथिव्याम्) अनेक प्रकार सुखदायक भूमि में (यः) जिस यज्ञ का अनुष्ठान करता हूं, वह (व्रजम्) जलवृष्टिकारक मेघ को (गच्छ) प्राप्त ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
अपा॒ररुं॑ पृथि॒व्यै दे॑व॒यज॑नाद्वध्यासं व्र॒जं ग॑च्छ गो॒ष्ठानं॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्या श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्विष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क्। अर॑रो॒ दिवं॒ मा प॑प्तो द्र॒प्सस्ते॒ द्यां मा स्क॑न् व्र॒जं ग॑च्छ गो॒ष्ठानं॒ वर्ष॑तु ते॒ द्यौर्ब॑धा॒न दे॑व सवितः पर॒मस्यां॑ पृथि॒व्या श॒तेन॒ पाशै॒र्योऽस्मान्द्वेष्टि॒ यं च॑ व॒यं द्वि॒ष्मस्तमतो॒ मा मौ॑क्॥२६॥
Apārarumpṛthivyai devayajanādbadhyāsãvrajaṅgaccha goṣṭhānãvarṣatu te dyaurbadhāna deva savitaḥ paramasyāmpṛthivyā̃ śatena pāśairyā smāndveṣṭi yañca vayandviṣmastamato mā mauk.
Mantra 26: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे (देव) सर्वानन्द के देने वाले जगदीश्वर! (सवितः) सब प्राणियों में अन्तर्यामी, सत्य प्रकाश करनेहारे आप की कृपा से हम लोग परस्पर उपदेश करें क
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हे (देव) सर्वानन्द के देने वाले जगदीश्वर! (सवितः) सब प्राणियों में अन्तर्यामी, सत्य प्रकाश करनेहारे आप की कृपा से हम लोग परस्पर उपदेश करें कि जैसे यह सब का प्रकाश करने वाला सूर्य्यलोक इस पृथिवी में अनेक बन्धन के हेतु किरणों से खींचकर पृथिवी आदि सब पदार्थों को बांधता है, वैसे तुम भी दुष्टों को बांधकर अच्छे-अच्छे गुणों का प्रकाश करो और जैसे मैं (पृथिव्यै) पृथिवी में (देवयजनात्) विद्वान् लोग जिस संग्राम से अच्छे-अच्छ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
गा॒य॒त्रेण त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामि॒ त्रैष्टु॑भेन त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामि॒ जाग॑तेन त्वा॒ छन्द॑सा॒ परि॑गृह्णामि॒। सु॒क्ष्मा चासि॑ शि॒वा चा॑सि स्यो॒ना चासि॑ सु॒षदा॑ चा॒स्यू॑र्ज॑स्वती॒ चासि॒ पय॑स्वती च॥२७॥
Gāyatreṇa tvā chandasā parigṛhṇāmi traiṣṭubhena tvā chandasā parigṛhṇāmi jagatena tvā chandasā pari gṛhṇāmi.
Mantra 27: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
जिस यज्ञ से उत्तम पदार्थों के साथ (सुक्ष्मा) यह पृथिवी शोभायमान (असि) होती है (च) तथा जिससे सुखकारक गुण (च) अथवा मनुष्यों के साथ यह (शिवा) म
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जिस यज्ञ से उत्तम पदार्थों के साथ (सुक्ष्मा) यह पृथिवी शोभायमान (असि) होती है (च) तथा जिससे सुखकारक गुण (च) अथवा मनुष्यों के साथ यह (शिवा) मङ्गल की देने वाली (असि) होती है (च) तथा जिस कर के उत्तम से उत्तम सुखों के साथ यह पृथिवी (स्योना) सुख उत्पन्न करने वाली (असि) होती है (च) और जिससे उत्तम-उत्तम सुख करने वाले और चलने के साथ यह (सुषदा) सुख से स्थिति करने योग्य (असि) होती है [च] तथा जिन उत्तम यव आदि अन्नों के साथ य...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
पु॒रा क्रू॒रस्य॑ वि॒सृपो॑ विरप्शिन्नुदा॒दाय॑ पृथि॒वीं जी॒वदा॑नुम्। यामैर॑यँश्च॒न्द्रम॑सि स्व॒धाभि॒स्तामु॒ धीरा॑सोऽअनु॒दिश्य॑ यजन्ते। प्रो॒क्ष॒णीरा सा॑दय द्विष॒तो व॒धोऽसि॥२८॥
Purā krūrasya visṛpo virapśinn udādāya pṛthivīṃ jīvadānum. Yām airayaṃś candramasi svadhābhis tām u dhīrāso 'nudīśya yajante. Prokṣaṇīr ā sādaya dviṣato vadho 'si.
Mantra 28: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे (विरप्शिन्) महाशय महागुणवान् जगदीश्वर! आपने (याम्) जिस (स्वधाभिः) अन्न आदि पदार्थों से युक्त और (जीवदानुम्) प्राणियों को जीवन देने वाले प
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हे (विरप्शिन्) महाशय महागुणवान् जगदीश्वर! आपने (याम्) जिस (स्वधाभिः) अन्न आदि पदार्थों से युक्त और (जीवदानुम्) प्राणियों को जीवन देने वाले पदार्थ तथा (पृथिवीम्) बहुत सी प्रजायुक्त पृथिवी को (उदादाय) ऊपर उठाकर (चन्द्रमसि) चन्द्रलोक के समीप स्थापन की है, इस कारण [ताम्] उस पृथिवी को (धीरासः) धीर बुद्धि वाले पुरुष प्राप्त होकर आपके (अनुदिश्य) अनुकूल चलकर [ (यजन्ते) ] यज्ञ का अनुष्ठान नित्य करते हैं। जैसे (चन्द्रमसि) आ...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
प्रत्यु॑ष्ट॒ꣳ रक्षः॒ प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरा॑तयो॒ निष्ट॑प्त॒ꣳ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ऽअरा॑तयः। अनि॑शितोऽसि सपत्न॒क्षिद्वा॒जिनं॑ त्वा वाजे॒ध्यायै॒ सम्मा॑र्ज्मि। प्रत्यु॑ष्ट॒ꣳ रक्षः॒ प्रत्यु॑ष्टा॒ऽअरा॑तयो॒ निष्ट॑प्त॒ꣳ रक्षो॒ निष्ट॑प्ता॒ऽअरा॑तयः। अनि॑शितासि सपत्न॒क्षिद्वा॒जिनीं॑ त्वा वाजे॒ध्यायै॒ सम्मा॑र्ज्मि॥२९॥
Pratyuṣṭã rakṣaḥ pratyuṣṭāarātayo niṣṭaptã rakṣo niṣṭaptāarātayaḥ.
Mantra 29: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
मैं जिस [अनिशितः] अतिविस्तृत [सपत्नक्षित्] शत्रुओं के नाश करने वाले संग्राम से (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और जिससे (प्रत्युष्टा अर
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मैं जिस [अनिशितः] अतिविस्तृत [सपत्नक्षित्] शत्रुओं के नाश करने वाले संग्राम से (प्रत्युष्टं रक्षः) विघ्नकारी प्राणी और जिससे (प्रत्युष्टा अरातयः) सत्यविरोधी अच्छी प्रकार दाहरूप दण्ड को प्राप्त (असि) होते हैं, वा जिस बन्धन से (निष्टप्तं रक्षः) बांधने योग्य (निष्टप्ता अरातयः) विद्या के विघ्न करने वाले निरन्तर संताप को प्राप्त होते हैं, (त्वा) उस (वाजिनम्) वेग आदि गुण वाले संग्राम को (वाजेध्यायै) जो कि अन्न आदि पदार्...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
अदि॑त्यै॒ रास्ना॑सि॒ विष्णो॑र्वे॒ष्पोस्यू॒र्ज्जे त्वाऽद॑ब्धेन॒ त्वा॒ चक्षु॒षाव॑पश्यामि। अ॒ग्नेर्जि॒ह्वासि॑ सु॒हूर्दे॒वेभ्यो॒ धाम्ने॑ धाम्ने मे भव॒ यजु॑षे यजुषे॥३०॥
Adityai rāsnāsi viṣṇorveṣposyūrje tvādabdhena tvā cakṣuṣāvapaśyāmi.
Mantra 30: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
हे जगदीश्वर! जो आप (अदित्यै) पृथिवी के (रास्ना) रस आदि पदार्थों के उत्पन्न करने वाले (असि) हैं, (विष्णोः) व्यापक (वेष्पः) पृथिवी आदि सब पदार
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हे जगदीश्वर! जो आप (अदित्यै) पृथिवी के (रास्ना) रस आदि पदार्थों के उत्पन्न करने वाले (असि) हैं, (विष्णोः) व्यापक (वेष्पः) पृथिवी आदि सब पदार्थों में प्रवर्त्तमान भी (असि) हैं तथा (अग्नेः) भौतिक अग्नि के (जिह्वा) जीभरूप (असि) हैं वा (देवेभ्यः) विद्वानों के लिये (धाम्ने धाम्ने) जिनमें कि वे विद्वान् सुखरूप पदार्थों को प्राप्त होते हैं, जो तीनों धाम अर्थात् स्थान, नाम और जन्म हैं, उन धामों की प्राप्ति के तथा (यजुषे य...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।
स॒वि॒तुस्त्वा॑ प्रस॒वऽउत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रेण॒ सूर्य्य॑स्य र॒श्मिभिः॑। स॒वि॒तुर्वः॑ प्र॒स॒वऽउत्पु॑ना॒म्यच्छि॑द्रेण प॒वित्रे॑ण॒ सूर्य्य॑स्य र॒श्मिभिः॑। तेजो॑ऽसि शु॒क्रम॑स्य॒मृत॑मसि॒ धाम॒ नामा॑सि प्रि॒यं दे॒वाना॒मना॑धृष्टं देव॒यज॑नमसि॥३१॥
Savitustvā prasavautpunāmyacchidreṇa pavitreṇa sūryasya raśmibhiḥ.
Mantra 31: Sacred Yajña Blessing
🪔✨
जो यज्ञ (सवितुः) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये संसार में (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पवित्रेण) पवित्र तथा (सूर्य्यस्य) प्रकाशमय सूर्य्य की (रश
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जो यज्ञ (सवितुः) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये संसार में (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पवित्रेण) पवित्र तथा (सूर्य्यस्य) प्रकाशमय सूर्य्य की (रश्मिभिः) किरणों के साथ मिल के सब पदार्थों को शुद्ध करता है (त्वा) उस यज्ञ वा यज्ञकर्त्ता को मैं (उत्पुनामि) उत्कृष्टता के साथ पवित्र करता हूं। इसी प्रकार (सवितुः) परमेश्वर के (प्रसवे) उत्पन्न किये हुए संसार में (अच्छिद्रेण) निरन्तर (पवित्रेण) शुद्धिकारक (सूर्य्यस्य) जो कि ऐश्वर...
शुक्ल यजुर्वेद वाजसनेयि संहिता, अध्याय १ — दर्शपूर्णमास यज्ञ की प्रारंभिक क्रियाओं में प्रयुक्त।