सामवेद

Chapter 1

Purvarchika CHAPTER-1

Free preview

Perspective
Language

Journey overview

The Principle of Vaishvanara Agni-Tattva in Vedic Metaphysics

Purvarchika का यह अध्याय सामगान के माध्यम से चित्त की एकाग्रता और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग प्रशस्त करता है। अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Where Sāmaveda lines cite a Ṛgveda verse, Sanskrit was restored only after validating against that citation. Unvalidated lines were left or lightly cleaned of OCR noise.

Mantra 1

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

अग्न॒ आ या॑हि वी॒तये॑ गृणा॒नो ह॒व्यदा॑तये | नि होता॑ सत्सि ब॒र्हिषि॑ ||

Agna 4 yahi vitaye grnano havyadataye. Ni hota satsi barhisi.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 2

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वम॑ग्ने य॒ज्ञानां॒ होता॒ विश्वे॑षां हि॒तः | दे॒वेभि॒र्मानु॑षे॒ जने॑ ||

Tvam agne yajnanam hota visvesam hitah.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 3

Devatā: Agni · Ṛṣi: Kanva Medhatithi

अ॒ग्निं दू॒तं वृ॑णीमहे॒ होता॑रं वि॒श्ववे॑दसम् | अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Kanva Medhatithi, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 4

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

अ॒ग्निर्वृ॒त्राणि॑ जङ्घनद् द्रविण॒स्युर्वि॑प॒न्यया॑ | समि॑द्धः शु॒क्र आहु॑तः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 5

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ushana Kavya

प्रेष्ठं॑ वो॒ अति॑थिं स्तु॒षे मि॒त्रमि॑व प्रि॒यम् | अ॒ग्निं रथं॒ न वेद्य॑म् ||

Prestham vo atithim stuse mitram iva priyam. Agne ratham na vedyam.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ushana Kavya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 6

Devatā: Agni · Ṛṣi: Rshi

त्वं नो॑ अग्ने॒ महो॑भिः पा॒हि विश्व॑स्या॒ अरा॑तेः | उ॒त द्वि॒षो मर्त्य॑स्य ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Rshi, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 7

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

एह्यू॒ षु ब्रवा॑णि॒ ते ऽग्न॑ इ॒त्थेत॑रा॒ गिर॑: | ए॒भिर्व॑र्धास॒ इन्दु॑भिः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 8

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vatsa Kanva

आ ते॑ व॒त्सो मनो॑ यमत्पर॒माच्चि॑त्स॒धस्था॑त् | अग्ने॒ त्वांका॑मया गि॒रा

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vatsa Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 9

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वाम॑ग्ने॒ पुष्क॑रा॒दध्यथ॑र्वा॒ निर॑मन्थत | मू॒र्ध्नो विश्व॑स्य वा॒घत॑: ||

Tvam agne puskardad adhyatharva niraman- thata. Murdhno visvasya vaghatah.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 10

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva

र, अग्ने विवस्वदा भरास्मभ्यमूतये महे । देवो ह्यसि नो ९०॥

Agne vivasvadabharasmabhyam utaye mahe.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 11

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ayunksvahih

नम॑स्ते अग्न॒ ओज॑से गृ॒णन्ति॑ देव कृ॒ष्टय॑: | अमै॑र॒मित्र॑मर्दय ||

Namaste agna ojase grnanti deva krstayah. Amair amitram ardaya.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ayunksvahih, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 12

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva Gautama

दू॒तं वो॑ वि॒श्ववे॑दसं हव्य॒वाह॒मम॑र्त्यम् | यजि॑ष्ठमृञ्जसे गि॒रा ||

Dutam vo visvavedasatn havyavaham amar-

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva Gautama, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 13

Devatā: Agni · Ṛṣi: Prayoga Bhargava

उप॑ त्वा जा॒मयो॒ गिरो॒ देदि॑शतीर्हवि॒ष्कृत॑: | वा॒योरनी॑के अस्थिरन् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Prayoga Bhargava, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 14

Devatā: Agni · Ṛṣi: Madhucchanda

उप॑ त्वाग्ने दि॒वेदि॑वे॒ दोषा॑वस्तर्धि॒या व॒यम् | नमो॒ भर॑न्त॒ एम॑सि ||

Upa tvagne dive-dive dosavastar dhiya vayam.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Madhucchanda, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 15

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ajigarti Shunahshepa

जरा॑बोध॒ तद् वि॑विड्ढि वि॒शेवि॑शे य॒ज्ञिया॑य | स्तोमं॑ रु॒द्राय॒ दृशी॑कम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ajigarti Shunahshepa, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 16

Devatā: Agni Marutah · Ṛṣi: Kanva Medhatithi

प्रति॒ त्यं चारु॑मध्व॒रं गो॑पी॒थाय॒ प्र हू॑यसे | म॒रुद्भि॑रग्न॒ आ ग॑हि ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Kanva Medhatithi, देवता: Agni Marutah)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 17

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ajigarti Shunahshepa

अश्वं॒ न त्वा॒ वार॑वन्तं व॒न्दध्या॑ अ॒ग्निं नमो॑भिः | स॒म्राज॑न्तमध्व॒राणा॑म् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ajigarti Shunahshepa, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 18

Devatā: Agni · Ṛṣi: Prayoga Bhargava

औ॒र्व॒भृ॒गु॒वच्छुचि॑मप्नवान॒वदा हु॑वे | अ॒ग्निं स॑मु॒द्रवा॑ससम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Prayoga Bhargava, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 19

Devatā: Agni · Ṛṣi: Prayoga Bhargava

अ॒ग्निमिन्धा॑नो॒ मन॑सा॒ धियं॑ सचेत॒ मर्त्य॑: | अ॒ग्निमी॑धे वि॒वस्व॑भिः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Prayoga Bhargava, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 20

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vatsa Kanva

आदित्प्र॒त्नस्य॒ रेत॑सो॒ ज्योति॑ष्पश्यन्ति वास॒रम् | प॒रो यदि॒ध्यते॑ दि॒वा ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vatsa Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 21

Devatā: Agni · Ṛṣi: Prayoga Bhargava

अ॒ग्निं वो॑ वृ॒धन्त॑मध्व॒राणां॑ पुरू॒तम॑म् | अच्छा॒ नप्त्रे॒ सह॑स्वते ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Prayoga Bhargava, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 22

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

अ॒ग्निस्ति॒ग्मेन॑ शो॒चिषा॒ यास॒द् विश्वं॒ न्य१त्रिण॑म् | अ॒ग्निर्नो॑ वनते र॒यिम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 23

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva Gautama

अग्ने॑ मृ॒ळ म॒हाँ अ॑सि॒ य ई॒मा दे॑व॒युं जन॑म् | इ॒येथ॑ ब॒र्हिरा॒सद॑म् ||

Agne mrda mahain asyaya a devayum janam.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva Gautama, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 24

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

अग्ने॒ रक्षा॑ णो॒ अंह॑स॒: प्रति॑ ष्म देव॒ रीष॑तः | तपि॑ष्ठैर॒जरो॑ दह ||

Agne raksa no amhasah prati sma deva risatah.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 25

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

अग्ने॑ यु॒क्ष्वा हि ये तवाऽश्वा॑सो देव सा॒धव॑: | अरं॒ वह॑न्ति म॒न्यवे॑ ||

Agne yunksva hi ye tavasvaso deva sadhavah.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 26

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

नि त्वा॑ नक्ष्य विश्पते द्यु॒मन्तं॑ देव धीमहि | सु॒वीर॑मग्न आहुत ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 27

Devatā: Agni · Ṛṣi: Virupa Angirasa

अ॒ग्निर्मू॒र्धा दि॒वः क॒कुत्पति॑: पृथि॒व्या अ॒यम् | अ॒पां रेतां॑सि जिन्वति ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Virupa Angirasa, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 28

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ajigarti Shunahshepa

इ॒ममू॒ षु त्वम॒स्माकं॑ स॒निं गा॑य॒त्रं नव्यां॑सम् | अग्ने॑ दे॒वेषु॒ प्र वो॑चः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ajigarti Shunahshepa, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 29

Devatā: Agni · Ṛṣi: Gopavana Atreya

यं त्वा॑ गो॒पव॑नो गि॒रा चनि॑ष्ठदग्ने अङ्गिरः | स पा॑वक श्रुधी॒ हव॑म् ||

Tam tva gopavano gira janisthad agne

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Gopavana Atreya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 30

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva Gautama

परि॒ वाज॑पतिः क॒विर॒ग्निर्ह॒व्यान्य॑क्रमीत् | दध॒द् रत्ना॑नि दा॒शुषे॑ ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva Gautama, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 31

Devatā: Surya · Ṛṣi: Praskanva

उदु॒ त्यं जा॒तवे॑दसं दे॒वं व॑हन्ति के॒तव॑: | दृ॒शे विश्वा॑य॒ सूर्य॑म् ||

ऋत (वैश्विक प्राकृतिक व्यवस्था) एवं सर्वदेवता की स्तुति, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है। (ऋषि: Praskanva, देवता: Surya)।

वैश्वदेव बलि एवं शांति पाठ में प्रयुक्त, जिससे संपूर्ण पर्यावरण और ब्रह्मांड में शांति का विस्तार हो।

Mantra 32

Devatā: Agni · Ṛṣi: Kanva Medhatithi

क॒विम॒ग्निमुप॑ स्तुहि स॒त्यध॑र्माणमध्व॒रे | दे॒वम॑मीव॒चात॑नम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Kanva Medhatithi, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 33

Devatā: Apah · Ṛṣi: Rshi

शं नो॑ दे॒वीर॒भिष्ट॑य॒ आपो॑ भवन्तु पी॒तये॑ | शं योर॒भि स्र॑वन्तु नः ||

ऋत (वैश्विक प्राकृतिक व्यवस्था) एवं सर्वदेवता की स्तुति, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है। (ऋषि: Rshi, देवता: Apah)।

वैश्वदेव बलि एवं शांति पाठ में प्रयुक्त, जिससे संपूर्ण पर्यावरण और ब्रह्मांड में शांति का विस्तार हो।

Mantra 34

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ushana Kavya

कस्य॑ नू॒नं परी॑णसो॒ धियो॑ जिन्वसि दम्पते | गोषा॑ता॒ यस्य॑ ते॒ गिर॑: ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ushana Kavya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 35

Devatā: Agni · Ṛṣi: Shamyu Barhaspatya

य॒ज्ञाय॑ज्ञा वो अ॒ग्नये॑ गि॒रागि॑रा च॒ दक्ष॑से | प्रप्र॑ व॒यम॒मृतं॑ जा॒तवे॑दसं प्रि॒यं मि॒त्रं न शं॑सिषम्

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Shamyu Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 36

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharga Pragatha

पा॒हि नो॑ अग्न॒ एक॑या पा॒ह्यु१त द्वि॒तीय॑या | पा॒हि गी॒र्भिस्ति॒सृभि॑रूर्जां पते पा॒हि च॑त॒सृभि॑र्वसो ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharga Pragatha, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 37

Devatā: Agni · Ṛṣi: Shamyu Barhaspatya

बृ॒हद्भि॑रग्ने अ॒र्चिभि॑: शु॒क्रेण॑ देव शो॒चिषा॑ | भ॒रद्वा॑जे समिधा॒नो य॑विष्ठ्य रे॒वन्न॑: शुक्र दीदिहि द्यु॒मत्पा॑वक दीदिहि

Brhadbhir agne arcibhih sukrena deva Socisa.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Shamyu Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 38

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

त्वे अ॑ग्ने स्वाहुत प्रि॒यास॑: सन्तु सू॒रय॑: | य॒न्तारो॒ ये म॒घवा॑नो॒ जना॑नामू॒र्वान्दय॑न्त॒ गोना॑म् ||

Tve agne svahuta priyasah santu surayah.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 39

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bhardvaja

अग्ने॒ जरि॑तर्वि॒श्पति॑स्तेपा॒नो दे॑व र॒क्षस॑: | अप्रो॑षिवान्गृ॒हप॑तिर्म॒हाँ अ॑सि दि॒वस्पा॒युर्दु॑रोण॒युः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bhardvaja, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 40

Devatā: Agni · Ṛṣi: Praskanva Kanva

अग्ने॒ विव॑स्वदु॒षस॑श् चि॒त्रं राधो॑ अमर्त्य | आ दा॒शुषे॑ जातवेदो वहा॒ त्वम॒द्या दे॒वाँ उ॑ष॒र्बुध॑: ||

Agne vivasvadusasaScitram radho amartya.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Praskanva Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 41

Devatā: Agni · Ṛṣi: Shamyu Trinapani

त्वं न॑श्चि॒त्र ऊ॒त्या वसो॒ राधां॑सि चोदय | अ॒स्य रा॒यस्त्वम॑ग्ने र॒थीर॑सि वि॒दा गा॒धं तु॒चे तु न॑:

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Shamyu Trinapani, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 42

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharga Pragatha

त्वमित्स॒प्रथा॑ अ॒स्यग्ने॑ त्रातॠ॒तस्क॒विः | त्वां विप्रा॑सः समिधान दीदिव॒ आ वि॑वासन्ति वे॒धस॑: ||

Tvam it sapratha asyagne tratar rtah kavih.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharga Pragatha, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 43

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharga Pragatha

आ नो॑ अग्ने वयो॒वृधं॑ र॒यिं पा॑वक॒ शंस्य॑म् | रास्वा॑ च न उपमाते पुरु॒स्पृहं॒ सुनी॑ती॒ स्वय॑शस्तरम् ||

A no agne vayovrdham rayim pavaka Samsyam.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharga Pragatha, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 44

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubahri Kanva

यो विश्वा॒ दय॑ते॒ वसु॒ होता॑ म॒न्द्रो जना॑नाम् | मधो॒र्न पात्रा॑ प्रथ॒मान्य॑स्मै॒ प्र स्तोमा॑ यन्त्य॒ग्नये॑ ||

Yo visva dayate vasu hota mandro jananam.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubahri Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 45

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

ए॒ना वो॑ अ॒ग्निं नम॑सो॒र्जो नपा॑त॒मा हु॑वे | प्रि॒यं चेति॑ष्ठमर॒तिं स्व॑ध्व॒रं विश्व॑स्य दू॒तम॒मृत॑म् ||

Ena vo agnim namasorjo napatam a huve.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 46

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharga Pragatha

शेषे॒ वने॑षु मा॒त्रोः सं त्वा॒ मर्ता॑स इन्धते | अत॑न्द्रो ह॒व्या व॑हसि हवि॒ष्कृत॒ आदिद्दे॒वेषु॑ राजसि ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharga Pragatha, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 47

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubahri Kanva

अद॑र्शि गातु॒वित्त॑मो॒ यस्मि॑न्व्र॒तान्या॑द॒धुः | उपो॒ षु जा॒तमार्य॑स्य॒ वर्ध॑नम॒ग्निं न॑क्षन्त नो॒ गिर॑: ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubahri Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 48

Devatā: Agni · Ṛṣi: Manu Vaivasvata

अ॒ग्निरु॒क्थे पु॒रोहि॑तो॒ ग्रावा॑णो ब॒र्हिर॑ध्व॒रे | ऋ॒चा या॑मि म॒रुतो॒ ब्रह्म॑ण॒स्पतिं॑ दे॒वाँ अवो॒ वरे॑ण्यम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Manu Vaivasvata, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 49

Devatā: Agni · Ṛṣi: Suditi - Purumidhau Angirasau

अ॒ग्निमी॑ळि॒ष्वाव॑से॒ गाथा॑भिः शी॒रशो॑चिषम् | अ॒ग्निं रा॒ये पु॑रुमीळ्ह श्रु॒तं नरो॒ऽग्निं सु॑दी॒तये॑ छ॒र्दिः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Suditi - Purumidhau Angirasau, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 50

Devatā: Agni · Ṛṣi: Praskanva Kanva

श्रु॒धि श्रु॑त्कर्ण॒ वह्नि॑भिर्दे॒वैर॑ग्ने स॒याव॑भिः | आ सी॑दन्तु ब॒र्हिषि॑ मि॒त्रो अ॑र्य॒मा प्रा॑त॒र्यावा॑णो अध्व॒रम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Praskanva Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 51

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubahri Kanva

प्र दैवो॑दासो अ॒ग्निर्दे॒वाँ अच्छा॒ न म॒ज्मना॑ | अनु॑ मा॒तरं॑ पृथि॒वीं वि वा॑वृते त॒स्थौ नाक॑स्य॒ सान॑वि ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubahri Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 52

Devatā: Indra · Ṛṣi: Medhatithi and medhyathithi

अध॒ ज्मो अध॑ वा दि॒वो बृ॑ह॒तो रो॑च॒नादधि॑ | अ॒या व॑र्धस्व त॒न्वा॑ गि॒रा ममा ऽऽजा॒ता सु॑क्रतो पृण ||

इन्द्र आत्मबल, संकल्प-शक्ति और दैवीय ऐश्वर्य के प्रतीक हैं, जो तमोगुण और वृत्रासुर रूपी अज्ञान का भेदन करते हैं। (ऋषि: Medhatithi and medhyathithi, देवता: Indra)।

सोमयज्ञ के प्रातः और माध्यन्दिन सवन में इन्द्र को सोमरस की आहुति देकर आंतरिक पराक्रम और शक्ति की प्रार्थना की जाती है।

Mantra 53

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamitra Gathina

काय॑मानो व॒ना त्वं यन्मा॒तॄरज॑गन्न॒पः | न तत् ते॑ अग्ने प्र॒मृषे॑ नि॒वर्त॑नं॒ यद् दू॒रे सन्नि॒हाभ॑वः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamitra Gathina, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 54

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ghaura Kanva

नि त्वाम॑ग्ने॒ मनु॑र्दधे॒ ज्योति॒र्जना॑य॒ शश्व॑ते | दी॒देथ॒ कण्व॑ ऋ॒तजा॑त उक्षि॒तो यं न॑म॒स्यन्ति॑ कृ॒ष्टय॑: ||

Ni tvam agne manur dadhe jyotirjanaya

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ghaura Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 55

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

दे॒वो वो॑ द्रविणो॒दाः पू॒र्णां वि॑वष्ट्या॒सिच॑म् | उद्वा॑ सि॒ञ्चध्व॒मुप॑ वा पृणध्व॒मादिद्वो॑ दे॒व ओ॑हते ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 56

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ghora Kanva

मतं ब्रह्मणस्पततिः प्र देव्येतु प्रैतु ब्रह्मणस्पतिः प्र सूनृता | र t दे अच्छा वीरं न्यं प्धिराधसं देवा यज्ञं नयन्तु नः ॥ ॥

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ghora Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 57

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ghora Kanva

ऊ॒र्ध्व ऊ॒ षु ण॑ ऊ॒तये॒ तिष्ठा॑ दे॒वो न स॑वि॒ता | ऊ॒र्ध्वो वाज॑स्य॒ सनि॑ता॒ यद॒ञ्जिभि॑र्वा॒घद्भि॑र्वि॒ह्वया॑महे ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ghora Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 58

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubahri Kanva

प्र यं रा॒ये निनी॑षसि॒ मर्तो॒ यस्ते॑ वसो॒ दाश॑त् | स वी॒रं ध॑त्ते अग्न उक्थशं॒सिनं॒ त्मना॑ सहस्रपो॒षिण॑म् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubahri Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 59

Devatā: Agni · Ṛṣi: Ghora Kanva

प्र वो॑ य॒ह्वं पु॑रू॒णां वि॒शां दे॑वय॒तीना॑म् | अ॒ग्निं सू॒क्तेभि॒र्वचो॑भिरीमहे॒ यं सी॒मिद॒न्य ईळ॑ते ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Ghora Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 60

Devatā: Agni · Ṛṣi: Utkeela Katya

अ॒यम॒ग्निः सु॒वीर्य॒स्येशे॑ म॒हः सौभ॑गस्य | रा॒य ई॑शे स्वप॒त्यस्य॒ गोम॑त॒ ईशे॑ वृत्र॒हथा॑नाम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Utkeela Katya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 61

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

त्वम॑ग्ने गृ॒हप॑ति॒स्त्वं होता॑ नो अध्व॒रे | त्वं पोता॑ विश्ववार॒ प्रचे॑ता॒ यक्षि॒ वेषि॑ च॒ वार्य॑म् ||

Tvam agne grhapatis tvam hota no adhvare. Tvam pota visvavara praceta yaksi yasi ca

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 62

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamitra Gathina

सखा॑यस्त्वा ववृमहे दे॒वं मर्ता॑स ऊ॒तये॑ | अ॒पां नपा॑तं सु॒भगं॑ सु॒दीदि॑तिं सु॒प्रतू॑र्तिमने॒हस॑म् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamitra Gathina, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 63

Devatā: Agni · Ṛṣi: Shyavashva or Vamadeva Gautama

आ जुहोता हविषा मर्जयध्वं नि होतारं गृहपतिं दधिध्वम्‌ । = र इडस्पदे नमसा रातहव्यं सपर्यता यजतं पस्त्यानाम्‌ ॥ ॥

A juhota havisa marjayadhvam ni hotaram grhapatim dadhidhvam. Idaspade namasa

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Shyavashva or Vamadeva Gautama, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 64

Devatā: Agni · Ṛṣi: Upastuta Varshtihavya

चि॒त्र इच्छिशो॒स्तरु॑णस्य व॒क्षथो॒ न यो मा॒तरा॑व॒प्येति॒ धात॑वे | अ॒नू॒धा यदि॒ जीज॑न॒दधा॑ च॒ नु व॒वक्ष॑ स॒द्यो महि॑ दू॒त्यं१ चर॑न् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Upastuta Varshtihavya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 65

Devatā: Agni · Ṛṣi: Brhaduktha

इ॒दं त॒ एकं॑ प॒र ऊ॑ त॒ एकं॑ तृ॒तीये॑न॒ ज्योति॑षा॒ सं वि॑शस्व | सं॒वेश॑ने त॒न्व१श्चारु॑रेधि प्रि॒यो दे॒वानां॑ पर॒मे ज॒नित्रे॑ ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Brhaduktha, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 66

Devatā: Agni · Ṛṣi: Angirasa Kutsa

इ॒मं स्तोम॒मर्ह॑ते जा॒तवे॑दसे॒ रथ॑मिव॒ सं म॑हेमा मनी॒षया॑ | भ॒द्रा हि न॒: प्रम॑तिरस्य सं॒सद्यग्ने॑ स॒ख्ये मा रि॑षामा व॒यं तव॑ ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Angirasa Kutsa, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 67

Devatā: Vaishvanara Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

मू॒र्धानं॑ दि॒वो अ॑र॒तिं पृ॑थि॒व्या वै॑श्वान॒रमृ॒त आ जा॒तम॒ग्निम् | क॒विं स॒म्राज॒मति॑थिं॒ जना॑नामा॒सन्ना पात्रं॑ जनयन्त दे॒वाः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Vaishvanara Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 68

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

वि त्वदापो॒ न पर्व॑तस्य पृ॒ष्ठादु॒क्थेभि॑रिन्द्रानयन्त य॒ज्ञैः | तं त्वा॒भिः सु॑ष्टु॒तिभि॑र्वा॒जय॑न्त आ॒जिं न ज॑ग्मुर्गिर्वाहो॒ अश्वा॑: ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 69

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva Gautama

आ वो॒ राजा॑नमध्व॒रस्य॑ रु॒द्रं होता॑रं सत्य॒यजं॒ रोद॑स्योः | अ॒ग्निं पु॒रा त॑नयि॒त्नोर॒चित्ता॒द्धिर॑ण्यरूप॒मव॑से कृणुध्वम् ||

A vo rajanam adhvarasva rudram hotaram

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva Gautama, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 70

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

इ॒न्धे राजा॒ सम॒र्यो नमो॑भि॒र्यस्य॒ प्रती॑क॒माहु॑तं घृ॒तेन॑ | नरो॑ ह॒व्येभि॑रीळते स॒बाध॒ आग्निरग्र॑ उ॒षसा॑मशोचि ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 71

Devatā: Agni · Ṛṣi: Trishiras Tvashtra

प्र के॒तुना॑ बृह॒ता या॑त्य॒ग्निरा रोद॑सी वृष॒भो रो॑रवीति | दि॒वश्चि॒दन्ताँ॑ उप॒माँ उदा॑नळ॒पामु॒पस्थे॑ महि॒षो व॑वर्ध ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Trishiras Tvashtra, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 72

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

fy सयं तचल र अगिं नरो दीधिति जनयत प्रशास्तम्‌। दूरेदुशं गृहपतिमथव्युम्‌ ॥ ॥

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 73

Devatā: Agni · Ṛṣi: Budha-Gavishthirau of Atreyau

अबो॑ध्य॒ग्निः स॒मिधा॒ जना॑नां॒ प्रति॑ धे॒नुमि॑वाय॒तीमु॒षास॑म् | य॒ह्वा इ॑व॒ प्र व॒यामु॒ज्जिहा॑ना॒: प्र भा॒नव॑: सिस्रते॒ नाक॒मच्छ॑ ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Budha-Gavishthirau of Atreyau, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 74

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vatsapri Bhalandana

प्र भू॒र्जय॑न्तं म॒हां वि॑पो॒धां मू॒रा अमू॑रं पु॒रां द॒र्माण॑म् | नय॑न्तो॒ गर्भं॑ व॒नां धियं॑ धु॒र्हिरि॑श्मश्रुं॒ नार्वा॑णं॒ धन॑र्चम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vatsapri Bhalandana, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 75

Devatā: Pusha · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

शु॒क्रं ते॑ अ॒न्यद्य॑ज॒तं ते॑ अ॒न्यद्विषु॑रूपे॒ अह॑नी॒ द्यौरि॑वासि | विश्वा॒ हि मा॒या अव॑सि स्वधावो भ॒द्रा ते॑ पूषन्नि॒ह रा॒तिर॑स्तु ||

Sukram te anyad yajatam te anyad visurupe ahani dyaur ivasi. Visva hi maya avasi

ऋत (वैश्विक प्राकृतिक व्यवस्था) एवं सर्वदेवता की स्तुति, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Pusha)।

वैश्वदेव बलि एवं शांति पाठ में प्रयुक्त, जिससे संपूर्ण पर्यावरण और ब्रह्मांड में शांति का विस्तार हो।

Mantra 76

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamitra Gathina

इळा॑मग्ने पुरु॒दंसं॑ स॒निं गोः श॑श्वत्त॒मं हव॑मानाय साध | स्यान्न॑: सू॒नुस्तन॑यो वि॒जावा ऽग्ने॒ सा ते॑ सुम॒तिर्भू॑त्व॒स्मे ||

Idam agne purudamsam sanim goh Sasva-

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamitra Gathina, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 77

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vatsapri Bhalandana

प्र होता॑ जा॒तो म॒हान्न॑भो॒विन्नृ॒षद्वा॑ सीदद॒पामु॒पस्थे॑ | दधि॒र्यो धायि॒ स ते॒ वयां॑सि य॒न्ता वसू॑नि विध॒ते त॑नू॒पाः ||

Pra hota jato mahan nabhovin nrsadma

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vatsapri Bhalandana, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 78

Devatā: Vaishvanara Agni · Ṛṣi: Vasishtha Maitravaruni

प्र स॒म्राजो॒ असु॑रस्य॒ प्रश॑स्तिं पुं॒सः कृ॑ष्टी॒नाम॑नु॒माद्य॑स्य | इन्द्र॑स्येव॒ प्र त॒वस॑स्कृ॒तानि॒ वन्दे॑ दा॒रुं वन्द॑मानो विवक्मि ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasishtha Maitravaruni, देवता: Vaishvanara Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 79

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamitra Gathina

न्वसिता द ग्भिंणीधि जातवेदा सुभृतो गर्भिंणीभिः। जागवद्धिर्दविष्मद्धिर्मनुष्यैभिरग्नि र्‌ रेक दिवेदिव : ॥ ॥

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamitra Gathina, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 80

Devatā: Agni Rakshoha · Ṛṣi: Payu Bharadvaja

स॒नाद॑ग्ने मृणसि यातु॒धाना॒न्न त्वा॒ रक्षां॑सि॒ पृत॑नासु जिग्युः | अनु॑ दह स॒हमू॑रान्क्र॒व्यादो॒ मा ते॑ हे॒त्या मु॑क्षत॒ दैव्या॑याः ||

Sanad agne mrnasi yatudhanan na tva raksamsi

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Payu Bharadvaja, देवता: Agni Rakshoha)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 81

Devatā: Agni · Ṛṣi: Gaya Atreya

अग्न॒ ओजि॑ष्ठ॒मा भ॑र द्यु॒म्नम॒स्मभ्य॑मध्रिगो | प्र नो॑ रा॒या परी॑णसा॒ रत्सि॒ वाजा॑य॒ पन्था॑म् ||

Agna ojisthama bhara dyumnamasmabhyam

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Gaya Atreya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 82

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva

चा ड र यदि अनु ष्यादगरिमिन्धीत । आजुह्छन्दव्यमानुषक्‌ शर्म भक्षीत दैव्यम्‌॥ ॥

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 83

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वे॒षस्ते॑ धू॒म ऋ॑ण्वति दि॒वि षञ्छु॒क्र आत॑तः | सूरो॒ न हि द्यु॒ता त्वं कृ॒पा पा॑वक॒ रोच॑से ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 84

Devatā: Agni · Ṛṣi: Bharadvaja Barhaspatya

त्वं हि क्षैत॑व॒द् यशो ऽग्ने॑ मि॒त्रो न पत्य॑से | त्वं वि॑चर्षणे॒ श्रवो॒ वसो॑ पु॒ष्टिं न पु॑ष्यसि ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Barhaspatya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 85

Devatā: Agni · Ṛṣi: Dvita Mrktavaha Atreya

प्रा॒तर॒ग्निः पु॑रुप्रि॒यो वि॒शः स्त॑वे॒ताति॑थिः | विश्वा॑नि॒ यो अम॑र्त्यो ह॒व्या मर्ते॑षु॒ रण्य॑ति ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Dvita Mrktavaha Atreya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 86

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vasuyavah Atreya

यद् वाहि॑ष्ठं॒ तद॒ग्नये॑ बृ॒हद॑र्च विभावसो | महि॑षीव॒ त्वद् र॒यिस्त्वद् वाजा॒ उदी॑रते ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vasuyavah Atreya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 87

Devatā: Agni · Ṛṣi: Gopavana Atreya

वि॒शोवि॑शो वो॒ अति॑थिं वाज॒यन्त॑: पुरुप्रि॒यम् | अ॒ग्निं वो॒ दुर्यं॒ वच॑: स्तु॒षे शू॒षस्य॒ मन्म॑भिः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Gopavana Atreya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 88

Devatā: Agni · Ṛṣi: Puru Atreya

बृ॒हद् वयो॒ हि भा॒नवेऽर्चा॑ दे॒वाया॒ग्नये॑ | यं मि॒त्रं न प्रश॑स्तिभि॒र्मर्ता॑सो दधि॒रे पु॒रः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Puru Atreya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 89

Devatā: Agni · Ṛṣi: Gopavana Atreya

आग॑न्म वृत्र॒हन्त॑मं॒ ज्येष्ठ॑म॒ग्निमान॑वम् | यस्य॑ श्रु॒तर्वा॑ बृ॒हन्ना॒र्क्षो अनी॑क॒ एध॑ते ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Gopavana Atreya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 90

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva Kashyapo va Maruchah

दे जातः परेण ध यत्‌ सवृद्धिः सहाभुवः। द र्‌ पिता यत्कश्यपस्यागिः श्रद्धा माता मनुः कविः॥ ९०॥

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva Kashyapo va Maruchah, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 91

Devatā: Vishvedeva · Ṛṣi: Agni Tapasa

सोमं॒ राजा॑न॒मव॑से॒ऽग्निं गी॒र्भिर्ह॑वामहे | आ॒दि॒त्यान्विष्णुं॒ सूर्यं॑ ब्र॒ह्माणं॑ च॒ बृह॒स्पति॑म् ||

Somam rajanam varunam agnim anvarabha-

ऋत (वैश्विक प्राकृतिक व्यवस्था) एवं सर्वदेवता की स्तुति, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है। (ऋषि: Agni Tapasa, देवता: Vishvedeva)।

वैश्वदेव बलि एवं शांति पाठ में प्रयुक्त, जिससे संपूर्ण पर्यावरण और ब्रह्मांड में शांति का विस्तार हो।

Mantra 92

Devatā: Angirah · Ṛṣi: Vamadeva

इत एत दिवः पृष्ठान्या रुहन्‌। प्र भूर्जयो यथा पथोद्‌ ययुः ॥ ९२॥

ऋत (वैश्विक प्राकृतिक व्यवस्था) एवं सर्वदेवता की स्तुति, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है। (ऋषि: Vamadeva, देवता: Angirah)।

वैश्वदेव बलि एवं शांति पाठ में प्रयुक्त, जिससे संपूर्ण पर्यावरण और ब्रह्मांड में शांति का विस्तार हो।

Mantra 93

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vamadeva Kashyapa Asito Devalova

र्‌ द राये अग्रे महे त्वा दानाय समिधीमदहि। हि महै दषं हतर ईडिष्वा हि महे वृषं द्यावा होत्राय पृथिवी ॥ ॥

Raye agne mahe tva danaya samidhimahi.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vamadeva Kashyapa Asito Devalova, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 94

Devatā: Agni · Ṛṣi: Somahuti Bhargava

द॒ध॒न्वे वा॒ यदी॒मनु॒ वोच॒द् ब्रह्मा॑णि॒ वेरु॒ तत् | परि॒ विश्वा॑नि॒ काव्या॑ ने॒मिश्च॒क्रमि॑वाभवत् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Somahuti Bhargava, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 95

Devatā: Agni Rakshoha · Ṛṣi: Bharadvaja Payu

प्रत्य॑ग्ने॒ हर॑सा॒ हर॑: शृणी॒हि वि॒श्वत॒: प्रति॑ | या॒तु॒धान॑स्य र॒क्षसो॒ बलं॒ वि रु॑ज वी॒र्य॑म् ||

Pratyagne harasa harah srnahi visvatas pari.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Bharadvaja Payu, देवता: Agni Rakshoha)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 96

Devatā: Devah · Ṛṣi: Devah Devatah, Praskanva Kanva

त्वम॑ग्ने॒ वसूँ॑रि॒ह रु॒द्राँ आ॑दि॒त्याँ उ॒त | यजा॑ स्वध्व॒रं जनं॒ मनु॑जातं घृत॒प्रुष॑म् ||

Tvam agne vasum riha rudram ddityam uta.

ऋत (वैश्विक प्राकृतिक व्यवस्था) एवं सर्वदेवता की स्तुति, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है। (ऋषि: Devah Devatah, Praskanva Kanva, देवता: Devah)।

वैश्वदेव बलि एवं शांति पाठ में प्रयुक्त, जिससे संपूर्ण पर्यावरण और ब्रह्मांड में शांति का विस्तार हो।

Mantra 97

Devatā: Agni · Ṛṣi: Dirghatama Auchathya

पु॒रु त्वा॑ दा॒श्वान् वो॑चे॒ ऽरिर॑ग्ने॒ तव॑ स्वि॒दा | तो॒दस्ये॑व शर॒ण आ म॒हस्य॑ ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Dirghatama Auchathya, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 98

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamitra Gathina

प्र होत्रे॑ पू॒र्व्यं वचो॒ऽग्नये॑ भरता बृ॒हत् | वि॒पां ज्योतीं॑षि॒ बिभ्र॑ते॒ न वे॒धसे॑ ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamitra Gathina, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 99

Devatā: Agni · Ṛṣi: Gotama Rahugana

अग्ने॒ वाज॑स्य॒ गोम॑त॒ ईशा॑नः सहसो यहो | अ॒स्मे धे॑हि जातवेदो॒ महि॒ श्रव॑: ||

Agne vajasya gomata tsanah sahaso yaho.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Gotama Rahugana, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 100

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamitra Gathina

अग्ने॒ यजि॑ष्ठो अध्व॒रे दे॒वान् दे॑वय॒ते य॑ज | होता॑ म॒न्द्रो वि रा॑ज॒स्यति॒ स्रिध॑: ||

Agne yajistho adhvare devan devayate yaja. Hota mandro vi rajasyati sridhah.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamitra Gathina, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 101

Devatā: Pavamana Soma · Ṛṣi: Trita Aptya

ज॒ज्ञा॒नं स॒प्त मा॒तरो॑ वे॒धाम॑शासत श्रि॒ये | अ॒यं ध्रु॒वो र॑यी॒णां चिके॑त॒ यत् ||

सोम ब्रह्मानंद, रस और आत्मिक शांति का प्रतीक है। विवेक-रूपी छलनी से शुद्ध होकर यह चेतना में अमृत-रस का संचार करता है। (ऋषि: Trita Aptya, देवता: Pavamana Soma)।

सोम के अभिषव और दशापवित्र (ऊन की छलनी) से शोधन के समय 'पवस्व' मंत्रों के सस्वर सामगान का विधान है।

Mantra 102

Devatā: Aditi · Ṛṣi: Irimbithi Kanva

उ॒त स्या नो॒ दिवा॑ म॒तिरदि॑तिरू॒त्या ग॑मत् | सा शंता॑ति॒ मय॑स्कर॒दप॒ स्रिध॑: ||

ऋत (वैश्विक प्राकृतिक व्यवस्था) एवं सर्वदेवता की स्तुति, जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के मध्य सामंजस्य स्थापित करती है। (ऋषि: Irimbithi Kanva, देवता: Aditi)।

वैश्वदेव बलि एवं शांति पाठ में प्रयुक्त, जिससे संपूर्ण पर्यावरण और ब्रह्मांड में शांति का विस्तार हो।

Mantra 103

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamana Vaiyashva

ईळि॑ष्वा॒ हि प्र॑ती॒व्यं१ यज॑स्व जा॒तवे॑दसम् | च॒रि॒ष्णुधू॑म॒मगृ॑भीतशोचिषम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamana Vaiyashva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 104

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamana Vaiyashva

न तस्य॑ मा॒यया॑ च॒न रि॒पुरी॑शीत॒ मर्त्य॑: | यो अ॒ग्नये॑ द॒दाश॑ ह॒व्यदा॑तिभिः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamana Vaiyashva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 105

Devatā: Agni · Ṛṣi: Rjishva Bharadvaja

अप॒ त्यं वृ॑जि॒नं रि॒पुं स्ते॒नम॑ग्ने दुरा॒ध्य॑म् | द॒वि॒ष्ठम॑स्य सत्पते कृ॒धी सु॒गम् ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Rjishva Bharadvaja, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 106

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamana Vaiyashva

श्रु॒ष्ट्य॑ग्ने॒ नव॑स्य मे॒ स्तोम॑स्य वीर विश्पते | नि मा॒यिन॒स्तपु॑षा र॒क्षसो॑ दह ||

Srustyagne navasya me stomasya vira vispate.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamana Vaiyashva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 107

Devatā: Agni · Ṛṣi: Prayoga Bhargavah

प्र मंहि॑ष्ठाय गायत ऋ॒ताव्ने॑ बृह॒ते शु॒क्रशो॑चिषे | उप॑स्तुतासो अ॒ग्नये॑ ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Prayoga Bhargavah, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 108

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubhari Kanva

प्र सो अ॑ग्ने॒ तवो॒तिभि॑: सु॒वीरा॑भिस्तिरते॒ वाज॑भर्मभिः | यस्य॒ त्वं स॒ख्यमा॒वर॑: ||

Pra so agne tavotibhih suvirabhis tarati

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubhari Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 109

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubhari Kanva

तं गू॑र्धया॒ स्व॑र्णरं दे॒वासो॑ दे॒वम॑र॒तिं द॑धन्विरे | दे॒व॒त्रा ह॒व्यमोहि॑रे ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubhari Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 110

Devatā: Agni · Ṛṣi: Prayoga Bhargava Saubahri Kanva

मा नो॑ हृणीता॒मति॑थि॒र्वसु॑र॒ग्निः पु॑रुप्रश॒स्त ए॒षः | यः सु॒होता॑ स्वध्व॒रः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Prayoga Bhargava Saubahri Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 111

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubhari Kanva

भ॒द्रो नो॑ अ॒ग्निराहु॑तो भ॒द्रा रा॒तिः सु॑भग भ॒द्रो अ॑ध्व॒रः | भ॒द्रा उ॒त प्रश॑स्तयः ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubhari Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 112

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubhari Kanva

यजि॑ष्ठं त्वा ववृमहे दे॒वं दे॑व॒त्रा होता॑र॒मम॑र्त्यम् | अ॒स्य य॒ज्ञस्य॑ सु॒क्रतु॑म् ||

Yajistham tva vavrmahe devam devatra hota- ram amartyam. Asya yajnasya sukratum.

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubhari Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 113

Devatā: Agni · Ṛṣi: Saubhari Kanva

तद॑ग्ने द्यु॒म्नमा भ॑र॒ यत्सा॒सह॒त्सद॑ने॒ कं चि॑द॒त्रिण॑म् | म॒न्युं जन॑स्य दू॒ढ्य॑: ||

Tadagne dyumnama bhara yat sasaha sadane

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Saubhari Kanva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।

Mantra 114

Devatā: Agni · Ṛṣi: Vishvamana Vaiyashva

यद्वा उ॑ वि॒श्पति॑: शि॒तः सुप्री॑तो॒ मनु॑षो वि॒शि | विश्वेद॒ग्निः प्रति॒ रक्षां॑सि सेधति ||

अग्नि परमात्मा की जाज्वल्यमान ज्ञान-चेतना है जो अंतःकरण के अज्ञान और विकारों को भस्म करती है। (ऋषि: Vishvamana Vaiyashva, देवता: Agni)।

हवि-समर्पण और अग्निहोत्र में प्रमुखता से प्रयुक्त, जहाँ अग्नि समस्त देवों का मुख बनकर आहुतियाँ स्वीकार करते हैं।