अथर्ववेद

Kanda 1

Divine Protection, Healing & Overcoming Obstacles

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Bhaishajya & Raksha-Tattva: The Sacred Healing Arts and Psychosomatic Immunity

प्रथम काण्ड का मूल भाव 'आरोग्य एवं आध्यात्मिक सुरक्षा' है। वाणी के अधिपति वाचस्पति और दिव्य जल की स्तुति से जीवन में संतुलन और सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

शांतिकर्म, भैषज्य अनुष्ठान एवं रक्षा-विधान में प्रयुक्त। दुर्गुणों और व्याधियों के निवारण हेतु वैदिक औषधियों एवं अभिमंत्रित जल के प्रोक्षण का विधान है।

Mantra 1

Devatā: Vachaspati · Ṛṣi: Atharvan

ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः । वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे ॥

Ye triṣaptāḥ pariyanti viśvā rūpāṇi bibhrataḥ. Vācaspatirbalā teṣāṁ tanvo adya dadhātu me.

वाणी के अधिपति परमात्मा से संपूर्ण सृष्टि के २१ तत्वों (ज्ञानेन्द्रिय, कर्मेन्द्रिय, तन्मात्रा आदि) के सामंजस्य और आत्मबल की प्रार्थना।

वेदाध्ययन आरंभ, उपनयन एवं मेधा-जनन संस्कार में वाणी के संस्कार और धारणा-शक्ति की वृद्धि हेतु जप किया जाता है।

Mantra 2

Devatā: Parjanya & Apas · Ṛṣi: Atharvan

विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं भूरिधायसम् । विद्मो ष्वस्य मातरं पृथिवीं भूरिवर्षसम् ॥

Vidmā śarasya pitaraṁ parjanyaṁ bhūridhāyasam. Vidmo ṣvasya mātaraṁ pṛthivīṁ bhūrivarṣasam.

प्रकृति के पोषक तत्वों (पर्जन्य और पृथ्वी) का समन्वित रूप, जो समस्त जीवन और औषधियों का उद्गम स्थल है।

भैषज्य कर्म में औषधियों के शोधन और यज्ञाहुति में प्रयुक्त, जिससे प्राकृतिक चिकित्सा की प्रभावशीलता बढ़ती है।